Friday, January 22, 2016

ग्रहों की गति से जानें जीवन में प्रभाव

 संसार में पाये जाने वाले समस्त प्राणी, पेड़-पौधे , नदी, पर्वत, मृदा आदि ग्रहों के अधीन होते  हैं। कर्मों के अनुसार अच्छा-बुरा जैसा भी फल मिलता है, उसके लिए भी ग्रह उत्तरदायी होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु नवग्रह कहलाते हैं। इन सभी ग्रहों का अपना-अपना शुभ-अशुभ प्रभाव होता है। इसके अलावा इन सभी ग्रहों की भाग्योदयकाल अवधि तथा विभिन्न राशियों पर भोग की अवधि भी निश्चित होती है।
सीधी और वक्री गति
सभी ग्रह सौर मंडल के सर्वाधिक सशक्त सूर्य के चारों ओर अपनी-अपनी कक्षाओं में रहकर गति करते हैं। यह गति सीधी अथवा वक्री होती है। नवग्रहों में केवल सूर्य एवं चंद्र ही ऐसे ग्रह हैं जो सदैव सीधी गति से चलते हैं। जबकि छाया ग्रह माने जाने वाले राहु और केतु ग्रह की गति हमेशा वक्री ही होती है। वहीं मंगल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि ग्रह सीधी एवं वक्री दोनों प्रकार की गति से चलते हैं। ग्रहों की गति सीधी है या वक्री, इसकी जानकारी जन्म कुंडली से आसानी से मिल जाती है।
वक्री गति के प्रभाव
नवग्रहों में वक्री गति से चलने वाले ग्रहों का प्रभाव शुभ होता है अथवा अशुभ, इस संबंध में ज्योतिष शास्त्र के जानकारों में एकमत नहीं है। "जातकतत्व " ग्रंथ के अनुसार वक्री ग्रहों का शुभ-अशुभ प्रभाव सीधी गति से चलने वाले ग्रहों से सामान ही होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर वक्री ग्रह अपनी उच्च राशि में है अथवा शुभ स्थान का स्वामी है तो जातक पर उसका प्रभाव भी शुभ होगा जिससे उसके जीवन में धन, सुख, यश, सफलता, और सम्मांन आदि प्राप्त होते रहेंगे वहीं वक्री ग्रह के अपनी नीच या शत्रु राशि में होने अथवा पाप स्थान में होने के प्रभाव से जातक का जीवन कष्टमय होगा।
"सारावली "ग्रंथ में कहा गया है कि वक्री ग्रह के कुंडली में शुभ स्थान का स्वामी बनकर उच्च, स्व राशि, मूल त्रिकोण या मित्र राशि में होने से वह जातक के जीवन में शुभ प्रभाव ही देगा। "फलप्रदीपिका" ग्रंथ के अनुसार वक्री ग्रह प्रत्येक दशा में उच्च दशा के ग्रहों के समान ही शुभ फल देते हैं। नीच या शत्रु राशि में होने के बावजूद अगर वक्री ग्रह शुभ स्थान का स्वामी हो तो सदैव शुभ फल ही देगा। 
कहने का अर्थ यह है कि वक्री ग्रह का शुभ या अशुभ प्रभाव जानने के लिए लग्न कुंडली का सघनतापूर्वक विश्लेषण आवश्यक है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि वक्री ग्रह की स्थिति क्या है। नीच या शत्रु राशि में वक्री ग्रह का होना दुःख, रोग या कष्ट का कारण बन सकता है।
अशुभ प्रभाव को करें दूर
वक्री ग्रह के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए उस ग्रह से सम्बंधित वस्तुओं का दान, पूजा-पाठ, मंत्र जप और रत्न धारण करना उपयुक्त होता है लेकिन इसके लिए कुंडली की सटीक मीमांसा और उचित ज्योतिष परामर्श अनिवार्य है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद, आगरा 

भद्रा में न करें मंगल कार्य

ज्योतिष शास्त्र में तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण के स्पष्ट मान आदि को पंचांग कहा जाता है।  कोई भी मंगल कार्य करने से पहले पंचांग का अध्ययन करके शुभ मुहूर्त निकाला जाता है, परंतु पंचांग में कुछ समय या अवधि ऐसी भी होती है जिसमें कोई भी मंगल कार्य करना निषिद्ध माना जाता है अन्यथा इसके करने से अनिष्ट होने की संभावना रहती है।  ऐसा ही निषिद्ध समय है "भद्रा"। भगवान सूर्य और उनकी पत्नी छाया से उत्पन्न भद्रा शनि देव की सगी बहिन हैं।  विश्वकर्मा के पुत्र विश्वस्वरूप भद्रा के पति हैं। भद्रा के बारह नाम हैं - धन्या, दधिमुखी, कुलपुत्रिका, भैरवी, महाकाली, असुराणा, महामारी, विष्टि, खरानना, कालरात्रि, महारुद्र और क्षयंकरी।
भद्रा का स्वरुप 
भद्रा का स्वरुप अत्यंत विकराल बताया गया है। इनका रंग काला, केश लंबे और दांत बड़े-बड़े हैं। ब्रह्मा जी के आदेश से भद्रा, काल के एक अंश के रूप में विराजमान रहती है  अपनी उपेक्षा या अपमान करने वालों के कार्यों में विघ्न पैदा करके विपरीत परिणाम देती है। यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश, कृषि, उद्योग, रक्षा बंधन, होलिका दहन, दाह कर्म जैसे कार्य भद्रा के दौरान नहीं किये जाते हैं।
भद्रा के प्रकार
मुहूर्त ग्रंथ के अनुसार शुक्ल पक्ष की भद्रा बृश्चिकी तथा कृष्ण पक्ष की भद्रा सर्पिणीकहलाती है। बृश्चिकी भद्रा के पुच्छ भाग में एवं सर्पिणी भद्रा के मुख भाग में किसी प्रकार का मंगल कार्य नहीं करना चाहिए। महिर्षि भृगु की संहिता में कहा गया है कि सोमवार और शुक्रवार की भद्रा कल्याणकारी, गुरूवार की पुण्यकारी, शनिवार की बृश्चिकी और मंगलवार, बुधवार तथा रविवार की भद्रा भद्रिका होती है। इसलिए अगर सोमवार, गुरूवार एवं शुक्रवार के दिन भद्रा  हो तो उसका दोष नहीं होता है।
कहां और कब रहती है भद्रा 
 माना जाता है कि भद्रा स्वर्ग लोक, पाताल लोक तथा पृथ्वी लोक में रहकर वहां के लोगों को सुख-दुःख का अनुभव कराती है। जब चंद्रमा मेष, वृष, मिथुन और वृश्चिक राशि में होते हैं तब भद्रा स्वर्ग लोक में रहती है। चंद्रमा के कुंभ, मीन, कर्क और सिंह राशि में होने पर भद्रा पृथ्वी लोक में तथा चंद्रमा के कन्या, तुला, धनु एवं मकर राशि में होने पर भद्रा पाताल लोक में निवास करती है। किसी भी मुहूर्त काल में भद्रा का वास पांच घटी मुख में, दो घटी कंठ में, ग्यारह घटी ह्रदय में, चार घटी नाभि में, पांच घटी कमर में तथा तीन घटी पुच्छ में होता है। इस स्थिति में भद्रा क्रमशः कार्य, धन, प्राण आदि को नुक्सान पहुंचाती है परंतु पुच्छ में भद्रा का प्रभाव मंगलकारी होने से विजय और कार्यसिद्धि दायक होता है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णिमा के पूर्वार्ध, चतुर्थी एवं एकादशी के उत्तरार्ध में तथा कृष्ण पक्ष की तृतीया, दशमी के उत्तरार्ध, सप्तमी और चतुर्थी के पूर्वार्ध में भद्रा का वास रहता है।
भद्रा व्रत से परिहार
 भविष्य पुराण के अनुसार भद्रा दोष के परिहार के लिए भद्रा का व्रत और उद्यापन किया जाता है। इससे व्रत करने वालों को भद्रा का कोप भाजन नहीं होना पड़ता और उनके कार्य निर्विघ्न संपन्न हो जाते हैं। भद्रा  के अशुभ प्रभावों से बचने के लिए प्रतिदिन स्नान आदि के बाद भद्रा के बारह नामों का उच्चारण करना चाहिए। ऐसा करने से आरोग्य, धन एवं कार्यों में सफलता मिलती है। भद्रा के कारण होने वाले विघ्न से बचने के लिए "छायासूर्यसुते देवि विष्टिरिष्टार्थदायनी। पूजितासि यथाशक्त्या भद्रे भाद्रप्रदाभव।" मंत्र का जप करना चाहिए। --- ज्योतिषविद प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा