Saturday, July 2, 2016

30 अक्टूबर के बाद शहर में यूरो-2 के आॅटो लोडर नहीं चलेंगे

आॅटो लोडर के डीजल इंजन को सीएनजी में कराने का मौका
 सम्भागीय परिवहन अधिकारी जगदीश सिंह कुशवाह ने अवगत कराया है कि टीटीजेड के पूर्व में निर्णयानुसार वर्ष 2005-2006, 2006-2007 तक के यूरो-2 वाले आॅटो लोडर (जीबीडब्ल्यू-3000 कि0ग्रा तक) 31 मार्च 2016 के बाद नगर निगम सीमा में संचालन से बाहर किया जा चुका है। अपर जिलाधिकारी (नगर) की अध्यक्षता एवं पुलिस अधीक्षक (नगर) की उपस्थिति, आॅटो लोडर यूनियन के पदाधिकारियों की मौजूदगी में 21 जून को पुनः आॅटो लोडर संचालन के सम्बन्ध में बैठक की गयी। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि यूरो-2 के आॅटो लोडर, जो नगर निगम सीमा में 31 मार्च के बाद बाहर किये गये थे यदि सीएनजी से इंजन प्रतिस्थापित करा लेते हैं तो उन्हें शहर के अन्दर चलाने की अनुमति दे दी जायेगी। उन्होंने बताया कि 01 अप्रैल 2007 से 31 मार्च 2010 के मध्य पंजीकृत यूरो-2 डीजल चलित आॅटो लोडर को शहर सीमा में संचालन की तिथि 30 अक्टूबर 2016 तक नियत की गयी है। इस अवधि में अपने आॅटो लोडर के डीजल इंजन को सीएनजी से प्रतिस्थापित करा लें अन्यथा 30 अक्टूबर के बाद कोई भी यूरो-2 के आॅटो लोडर शहर सीमा में संचालित नहीं होगा। 

Tuesday, June 14, 2016

जीवन धारा है-गंगा

गंगा तेरा पानी अमृत.......

भारत की परंपरा और संस्कृति को अपने में समाहित किये पतित पावनी गंगा सदियों से समस्त प्राणियों के कल्याण का पर्याय बनकर इस धरा पर प्रवाहित हो  रही है। गंगा महज एक नदी मात्र ही नहीं है, बल्कि इस धरती को सिंचित कर अन्न उत्पादन करने वाली वह जीवन धारा है जिसका अमृत तुल्य जल लाखों-करोडों लोगों की आस्था का प्रतीक है। गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाकर एवं उसका आचमन करके लोग अपने को धन्य मानते हैं। माना जाता है कि गंगा का अवतरण ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को
हुआ था इसलिए यह तिथि  दशहरा के नाम से जानी जाती है।
गंगा के  विभिन्न नाम
पौराणिक कथा के अनुसार कपिल मुनि के श्राप से भस्म हुए अपने साठ हजार पूर्वजों की मुक्ति के लिए राजा भगीरथ ने कठोर तप करके देवनदी गंगा को धरती पर उतारने का वरदान प्राप्त था। तत्पश्चात गंगा के वेग को सहन करने के लिए भगवान शिव की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया। शिव की जटाओं से होती हुई गंगा ब्रह्मा द्वारा निर्मित बिन्दुसर सरोवर में उतरीं और वहां से पृथ्वीलोक पर अवतरित हुई। अपने पवित्र जल के स्पर्श से राजा भगीरथ के पूर्वजों को मोक्ष देने के कारण गंगा भागीरथी कहलायी। पाताल लोक में नाग योनियों के जीवों का तारण करने के कारण गंगा को भोगवती कहा गया। राजश्री जहु को पिता के समान सम्मान देने से गंगा का एक नाम जाह्नवी भी है। त्रिलोक में त्रिपथगा, स्वर्ग में मंदाकिनी एवं सुरसरि तथा भगवान विष्णु के बाएं पैर के अंगुष्ठ से प्रादुर्भाव होने से गंगा का नामकरण विष्णुपदी भी हुआ।
गंगा के पूजन की विधि
गंगा दशहरा पर गंगा नदी में स्नान करना अत्यंत ही शुभ माना गया है। अगर किसी कारण से गंगा में स्नान का अवसर न मिले तो  सादा जल में गंगा जल मिलाकर स्नान करना भी शुभ होता है। गंगा स्नान के बाद गंगा जी का पूजन दस प्रकार के पुष्प, दस प्रकार के फल, दस दीपक, दस तांबूल, दशांग धूप  आदि के साथ करना चाहिए तथा श्रद्धानुसार दस गरीबों एवं जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देना चाहिए। 

Wednesday, April 27, 2016

मंगल के लिए मंगल की आराधना

नवग्रहों में पराक्रमी शौर्य के प्रतीक भौम अर्थात मंगल ग्रह को भूमि पुत्र कहा गया है, इसलिए भूमि से जुड़े मामलों में मंगल का विशेष योगदान है। ज्योतिष शास्त्र में मंगल को युद्ध का देवता सेनापति माना गया है। मेष और वृश्चिक राशियों के स्वामी ग्रह मंगल मकर राशि में उच्च के तथा कर्क राशि में नीच के होते हैं। दुर्घटना, हथियार, रोग, साहस, पराक्रम, वीरता, भाई-बंधु, गृहस्थ सुख, शासक, शत्रु, आचरण, क्रोध, छल-कपट, चौर्य कर्म आदि के बारे में जानकारी के लिए मंगल ग्रह की स्थिति  का ही सहारा लिया जाता है।
मंगल का स्वरुप एवं प्रभाव
उग्र प्रकृति के मंगल की चार भुजाएं हैं, जो अभय मुद्रा, त्रिशूल, गदा एवं वर मुद्रा में दर्शित हैं। लाल वस्त्र और लाल माला धारण करने वाले मंगल का वाहन भेड़ा है। इनके मस्तक पर स्वर्ण मुकुट है। जन्म कुंडली में पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव में विराजमान मंगल की स्थिति जातक को मांगलिक बनाती है , वहीं मंगल कुंडली के जिस भाव में बैठे होते हैं, वहां से वे चौथे, सातवें एवं आठवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं।
अंक ज्योतिष में मंगल 
अंक ज्योतिष के अनुसार 9 का अंक मंगल का प्रतिनिधित्व करता है। जिन जातकों का जन्म किसी भी मास की 9, 18 और 27 तारीख को होता है, उनका जन्मांक 9 है और वे जीवन भर मंगल से प्रभावित रहते हैं। ऐसे जातक कठिन परिश्रम, लगन, साहस, और दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर ही जीवन में सफल हो पाते हैं। ऐसे जातकों को जीवन में शुभ प्रभाव के लिए अपने भोजन में प्याज, अनार, तिल, सरसों, अदरक, काली मिर्च, चुकंदर, गाजर, सेब आदि का सेवन अवश्य करना चाहिए।
मंगल के शुभ-अशुभ प्रभाव
मंगल के शुभ एवं बली होने पर जातक अनुशासन प्रिय, सर्जन, मजबूत, आकर्षक, जमींदार, सैन्यकर्मी, पुलिस अधिकारी, गुप्तचर विभाग आदि में साहसपूर्ण कार्य करने वाला अधिकारी होता है। जबकि अशुभ एवं दोषपूर्ण मंगल के प्रभाव से जातक आपराधिक कार्य करने लगता है तथा अक्सर चेचक, ज्वर, पित्त विकार, घाव, फोड़ा-फुंसी, रक्तस्राव जैसी बीमारियों से ग्रस्त बना रहता है।
मंगल की शांति के उपाय
मंगल ग्रह की शांति एवं प्रसन्नता के लिए भगवान शिव और हनुमान जी की उपासना की जाती है। स्वास्थ्य लाभ एवं प्रसन्नता के लिए नियमित रूप से "ॐ अंगारकाय नमः" अथवा "ॐ भौं भौमाय नमः" मंत्र का जप करना चाहिए। मंगल के अशुभ प्रभावों को काम करने के लिए स्वर्ण, तांबा, गुड, गेहूं, लाल वस्त्र, लाल चंदन, लाल पुष्प, लाल फल, मसूर की दाल आदि का दान किया जाता है। भूमि लाभ के लिए मंगलवार को गुड की रेवडिया मछलियों को अथवा गुड चना बंदरों को खिलाना चाहिए। पराक्रमी संतान प्राप्ति के लिए घर में गुड का मीठा पराठा बनाकर मंगलवार को गरीब बच्चों को खिलाना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल

Saturday, February 27, 2016

ज्योतिष में पेड़-पौधों की उपयोगिता

 पर्यावरण को हरा-भरा और प्रदूषण मुक्त बनाये रखने में वृक्षों का महत्वपूर्ण योगदान है। एक वृक्ष सौ पुत्रों से भी बढ़कर है क्योंकि वह जीवन भर अपने पालक को समान एवं निःस्वार्थ भाव से लाभ पहुंचाता रहता है। भविष्य पुराण के अनुसार संतानहीन मनुष्य द्वारा लगाया गया वृक्ष लौकिक और पारलौकिक कर्म करता है। लोमेश संहिता में कहा गया है कि जहां पर तुलसी का वृक्ष स्वयं उत्पन्न होता है तथा निंब, अश्वत्थ आदि के वृक्ष हों, वहां निश्चित ही देवता निवास करते हैं। आचार्य वराहमिहिर ने वृक्षों को वस्त्र से ढककर चंदन और पुष्पमाला अर्पित कर उनके नीचे हवन करने को श्रेष्ठ बताया है। पितरों की संतुष्टि के लिए भी वृक्ष लगाने की परंपरा है।
ज्योतिष में वृक्ष 
ज्योतिष शास्त्र में वृक्षों को देवताओं और ग्रहों के निमित्त लगाकर उनसे शुभ लाभ प्राप्त किये जाने का उल्लेख मिलता है। पीपल के वृक्ष में सभी देवताओं का तो आंवला और तुलसी में विष्णु का, बेल और बरगद में भगवान शिव का जबकि कमल में महालक्ष्मी का वास माना गया है। जामुन का वृक्ष धन दिलाता है तो पाकड़ ज्ञान और सुयोग्य पत्नी दिलाने में मदद करता है। बकुल को पापनाशक, तेंदु को कुलवृद्धि, अनार को विवाह कराने में सहायक और अशोक को शोक मिटाने वाला बताया गया है। श्रद्धा भाव से लगाया गया वृक्ष कई मनोकामनाओं की पूर्ति करता है। कन्या के विवाह में देरी हो रही हो तो कदली वृक्ष की सूखी पत्तियों से बने आसान पर बैठकर कात्यायनी देवी की पूजा करने चाहिए। शनि ग्रह के अशुभ फल को दूर करने हेतु शमी वृक्ष के पूजन से लाभ मिलता है। कदंब व आंवला वृक्ष के नीचे बैठकर यज्ञ करने से लक्ष्मी जी कृपा मिलती है।
हवन समिधा हेतु वृक्ष 
नवग्रहों को प्रसन्न करने के लिए ज्योतिष में मंत्रजाप के साथ हवन किया जाता है। इस हेतु जिस समिधा का प्रयोग होता है वह वृक्ष से ही मिलती है। सूर्य के लिए मदार, चंद्र के लिए पलाश, मंगल के लिए खैर, बुध के लिए अपामार्ग, गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए गूलर, शनि के लिए शमी, राहु के लिए दूर्वा और केतु के लिए कुश वृक्ष की समिधा प्रयुक्त होती है।
सही नक्षत्र में वृक्षारोपण और कृषि कार्य 
फसल की कटाई, मढ़ाई, बुवाई, हल जोतने, बीज डालने, वृक्ष लगाने तथा अन्य कृषि कार्यों के लिए ज्योतिष में कृत्तिका, मृगशिरा, श्लेषा, मघा, उत्तराषाढ़ श्रवण धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों को शुभ माना गया है।
 ग्रह शांति हेतु जड़ी बूटी 
अशुभ प्रभाव देने वाले ग्रहों की शांति और प्रसन्नता के लिए ज्योतिष में रत्नों के स्थान पर जड़ी बूटी धारण करने की सलाह दी जाती है जो वृक्षों से ही प्राप्त होती है। सूर्य के लिए बेलपत्र, चंद्र के लिए खजूर या खिरनी, मंगल के लिए अनंतमूल, बुध के लिए विधारा, गुरु के लिए भृंगराज, शुक्र के लिए अश्वगंध, शनि के लिए शमी, राहु के लिए श्वेत चंदन और केतु के लिए असगंध की जड़ को शुभ दिन और नक्षत्र में लाकर विधि-विधान से धारण कर सकते हैं।
स्वप्न विचार और वृक्ष 
स्वप्न में पेड़-पौधे, फल, पुष्प, पुष्पों की माला, गेंहू, जौ, सरसों, बेलपत्र आदि का दिखना राजपद, धन, सम्मान, और विद्या प्राप्ति का संकेत है , वहीँ स्वप्न में काला पुष्प, कपास और आक का वृक्ष देखना कष्टकर, रोगदायी एवं समस्याओं का संकेत  देता  है।
दान हेतु वृक्ष और उत्पाद 
ज्योतिष में नवग्रहों को प्रसन्न करने और उनके शुभ प्रभाव के लिए दान करना उपयुक्त उपाय है। इस हेतु वृक्ष और उनसे मिलने वाले उत्पादों का दान भी किया जाता है। सूर्य हेतु गेंहू, लाल कमल, चना, मसूर की दाल, गुड़, चंद्र हेतु चीनी, मैदा, सूजी, रसदार फल, मंगल हेतु गैंहू. मसूर, कनेर, मुनक्का, छुआरा, मोठ, बुध हेतु हरे फल और हरी सब्जियां, मूंग, हरी मटर, सौंफ, गुरु हेतु पीले फल, बेसन, प्याज,अदरक, शहद, हल्दी, चने की दाल, शुक्र के लिए चावल, मिश्री, रुई, कच्चा नारियल, शनि, राहु एवं केतु के लिए उड़द, काले तिल, जाता वाला नारियल, कली मिर्च आदि का दान किया जाता है।-- ज्योतिषविद प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा  

Friday, January 22, 2016

ग्रहों की गति से जानें जीवन में प्रभाव

 संसार में पाये जाने वाले समस्त प्राणी, पेड़-पौधे , नदी, पर्वत, मृदा आदि ग्रहों के अधीन होते  हैं। कर्मों के अनुसार अच्छा-बुरा जैसा भी फल मिलता है, उसके लिए भी ग्रह उत्तरदायी होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु नवग्रह कहलाते हैं। इन सभी ग्रहों का अपना-अपना शुभ-अशुभ प्रभाव होता है। इसके अलावा इन सभी ग्रहों की भाग्योदयकाल अवधि तथा विभिन्न राशियों पर भोग की अवधि भी निश्चित होती है।
सीधी और वक्री गति
सभी ग्रह सौर मंडल के सर्वाधिक सशक्त सूर्य के चारों ओर अपनी-अपनी कक्षाओं में रहकर गति करते हैं। यह गति सीधी अथवा वक्री होती है। नवग्रहों में केवल सूर्य एवं चंद्र ही ऐसे ग्रह हैं जो सदैव सीधी गति से चलते हैं। जबकि छाया ग्रह माने जाने वाले राहु और केतु ग्रह की गति हमेशा वक्री ही होती है। वहीं मंगल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि ग्रह सीधी एवं वक्री दोनों प्रकार की गति से चलते हैं। ग्रहों की गति सीधी है या वक्री, इसकी जानकारी जन्म कुंडली से आसानी से मिल जाती है।
वक्री गति के प्रभाव
नवग्रहों में वक्री गति से चलने वाले ग्रहों का प्रभाव शुभ होता है अथवा अशुभ, इस संबंध में ज्योतिष शास्त्र के जानकारों में एकमत नहीं है। "जातकतत्व " ग्रंथ के अनुसार वक्री ग्रहों का शुभ-अशुभ प्रभाव सीधी गति से चलने वाले ग्रहों से सामान ही होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर वक्री ग्रह अपनी उच्च राशि में है अथवा शुभ स्थान का स्वामी है तो जातक पर उसका प्रभाव भी शुभ होगा जिससे उसके जीवन में धन, सुख, यश, सफलता, और सम्मांन आदि प्राप्त होते रहेंगे वहीं वक्री ग्रह के अपनी नीच या शत्रु राशि में होने अथवा पाप स्थान में होने के प्रभाव से जातक का जीवन कष्टमय होगा।
"सारावली "ग्रंथ में कहा गया है कि वक्री ग्रह के कुंडली में शुभ स्थान का स्वामी बनकर उच्च, स्व राशि, मूल त्रिकोण या मित्र राशि में होने से वह जातक के जीवन में शुभ प्रभाव ही देगा। "फलप्रदीपिका" ग्रंथ के अनुसार वक्री ग्रह प्रत्येक दशा में उच्च दशा के ग्रहों के समान ही शुभ फल देते हैं। नीच या शत्रु राशि में होने के बावजूद अगर वक्री ग्रह शुभ स्थान का स्वामी हो तो सदैव शुभ फल ही देगा। 
कहने का अर्थ यह है कि वक्री ग्रह का शुभ या अशुभ प्रभाव जानने के लिए लग्न कुंडली का सघनतापूर्वक विश्लेषण आवश्यक है जिससे यह स्पष्ट हो सके कि वक्री ग्रह की स्थिति क्या है। नीच या शत्रु राशि में वक्री ग्रह का होना दुःख, रोग या कष्ट का कारण बन सकता है।
अशुभ प्रभाव को करें दूर
वक्री ग्रह के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए उस ग्रह से सम्बंधित वस्तुओं का दान, पूजा-पाठ, मंत्र जप और रत्न धारण करना उपयुक्त होता है लेकिन इसके लिए कुंडली की सटीक मीमांसा और उचित ज्योतिष परामर्श अनिवार्य है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद, आगरा 

भद्रा में न करें मंगल कार्य

ज्योतिष शास्त्र में तिथि, वार, नक्षत्र, योग तथा करण के स्पष्ट मान आदि को पंचांग कहा जाता है।  कोई भी मंगल कार्य करने से पहले पंचांग का अध्ययन करके शुभ मुहूर्त निकाला जाता है, परंतु पंचांग में कुछ समय या अवधि ऐसी भी होती है जिसमें कोई भी मंगल कार्य करना निषिद्ध माना जाता है अन्यथा इसके करने से अनिष्ट होने की संभावना रहती है।  ऐसा ही निषिद्ध समय है "भद्रा"। भगवान सूर्य और उनकी पत्नी छाया से उत्पन्न भद्रा शनि देव की सगी बहिन हैं।  विश्वकर्मा के पुत्र विश्वस्वरूप भद्रा के पति हैं। भद्रा के बारह नाम हैं - धन्या, दधिमुखी, कुलपुत्रिका, भैरवी, महाकाली, असुराणा, महामारी, विष्टि, खरानना, कालरात्रि, महारुद्र और क्षयंकरी।
भद्रा का स्वरुप 
भद्रा का स्वरुप अत्यंत विकराल बताया गया है। इनका रंग काला, केश लंबे और दांत बड़े-बड़े हैं। ब्रह्मा जी के आदेश से भद्रा, काल के एक अंश के रूप में विराजमान रहती है  अपनी उपेक्षा या अपमान करने वालों के कार्यों में विघ्न पैदा करके विपरीत परिणाम देती है। यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश, कृषि, उद्योग, रक्षा बंधन, होलिका दहन, दाह कर्म जैसे कार्य भद्रा के दौरान नहीं किये जाते हैं।
भद्रा के प्रकार
मुहूर्त ग्रंथ के अनुसार शुक्ल पक्ष की भद्रा बृश्चिकी तथा कृष्ण पक्ष की भद्रा सर्पिणीकहलाती है। बृश्चिकी भद्रा के पुच्छ भाग में एवं सर्पिणी भद्रा के मुख भाग में किसी प्रकार का मंगल कार्य नहीं करना चाहिए। महिर्षि भृगु की संहिता में कहा गया है कि सोमवार और शुक्रवार की भद्रा कल्याणकारी, गुरूवार की पुण्यकारी, शनिवार की बृश्चिकी और मंगलवार, बुधवार तथा रविवार की भद्रा भद्रिका होती है। इसलिए अगर सोमवार, गुरूवार एवं शुक्रवार के दिन भद्रा  हो तो उसका दोष नहीं होता है।
कहां और कब रहती है भद्रा 
 माना जाता है कि भद्रा स्वर्ग लोक, पाताल लोक तथा पृथ्वी लोक में रहकर वहां के लोगों को सुख-दुःख का अनुभव कराती है। जब चंद्रमा मेष, वृष, मिथुन और वृश्चिक राशि में होते हैं तब भद्रा स्वर्ग लोक में रहती है। चंद्रमा के कुंभ, मीन, कर्क और सिंह राशि में होने पर भद्रा पृथ्वी लोक में तथा चंद्रमा के कन्या, तुला, धनु एवं मकर राशि में होने पर भद्रा पाताल लोक में निवास करती है। किसी भी मुहूर्त काल में भद्रा का वास पांच घटी मुख में, दो घटी कंठ में, ग्यारह घटी ह्रदय में, चार घटी नाभि में, पांच घटी कमर में तथा तीन घटी पुच्छ में होता है। इस स्थिति में भद्रा क्रमशः कार्य, धन, प्राण आदि को नुक्सान पहुंचाती है परंतु पुच्छ में भद्रा का प्रभाव मंगलकारी होने से विजय और कार्यसिद्धि दायक होता है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णिमा के पूर्वार्ध, चतुर्थी एवं एकादशी के उत्तरार्ध में तथा कृष्ण पक्ष की तृतीया, दशमी के उत्तरार्ध, सप्तमी और चतुर्थी के पूर्वार्ध में भद्रा का वास रहता है।
भद्रा व्रत से परिहार
 भविष्य पुराण के अनुसार भद्रा दोष के परिहार के लिए भद्रा का व्रत और उद्यापन किया जाता है। इससे व्रत करने वालों को भद्रा का कोप भाजन नहीं होना पड़ता और उनके कार्य निर्विघ्न संपन्न हो जाते हैं। भद्रा  के अशुभ प्रभावों से बचने के लिए प्रतिदिन स्नान आदि के बाद भद्रा के बारह नामों का उच्चारण करना चाहिए। ऐसा करने से आरोग्य, धन एवं कार्यों में सफलता मिलती है। भद्रा के कारण होने वाले विघ्न से बचने के लिए "छायासूर्यसुते देवि विष्टिरिष्टार्थदायनी। पूजितासि यथाशक्त्या भद्रे भाद्रप्रदाभव।" मंत्र का जप करना चाहिए। --- ज्योतिषविद प्रमोद कुमार अग्रवाल, आगरा