Friday, September 18, 2015

सौभाग्य के लिए हरतालिका तीज व्रत

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथिको हस्त नक्षत्र में हरतालिका तीज मनायी जाती है। इस तिथि को महिलायें भगवान शिव और माता पार्वती का विधि-विध न से पूजन करके सौभाग्य के लिए कामना करती हैं। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार जो महिलायें हरतालिका तीज व्रत करती हैं उन्हें जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। हरतालिका तीज को बूढ़ी तीज भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन विवाहित महिलायें महिलाओं को उनकी सास सुहाग का सिंधारा देती हैं और महिलाये अपनी सास के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।
ऐसे करे पूजा 
हरतालिका तीज वाले दिन महिलाओं को चाहिए कि वे संध्या काल में स्नान करके धुले हुए वस्त्र धारण करें और पीली व पवित्र मिट्टी से पार्वती और शिव की प्रतिमा बनाकर उनका पूजन सामिग्री से श्रद्धा भाव से पूजन करें। पूजन के उपरान्त एक सुहाग की पिटारी में सुहाग की समस्त वस्तुएं रखकर माता पार्वती के समक्ष चढ़ाना चाहिए और फल, मिष्ठान और पकवान आदि का भोग लगाना चाहिए।इसके अलावा भगवान शिव को धोती और अंगोछा चढ़ाना चहिये।  तत्पश्चात सुहाग पिटारी को किसी भी ब्राह्मण स्त्री को तथा धोती और अंगोछा किसे ब्राह्मण को दान करके उनका शुभ आशीर्वाद लेना चाहिए। सौभाग्यवती महिलाओं को इस दिन व्रत खोलने से पूर्व अपनी सासु मां को अपनी श्रद्धानुसार मिष्ठान, फल और व्यंजन आदि और कुछ धनराशि देकर उनके चरण स्पर्श करना चाहिए। इस प्रकार किये गए व्रत-विधान से माता पार्वती और भगवान शिव की कृपा से सौभाग्य सुख मिलता है।
हरतालिका तीज व्रत कथा 
हरतालिका तीज व्रत के सम्बन्ध में जो कथा प्रचलित है उसके अनुसार भगवान शिव ने पार्वती को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी। पूर्वजन्म में भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए गौरी ने हिमालय पर्वत पर गंगा के तट पर बाल्यावस्था में कठोर तप किया था। जिससे उनके पिता गिरिराज को बहुत कष्ट होता था। एक दिन नारद मुनि गौरी के पिता के घर आये और उन्होंने गिरिराज से कहा कि भगवान विष्णु ने गौरी की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके साथ विवाह करने का प्रस्ताव भिजवाया है। नारदजी की बात सुनकर गिरिराज तो प्रसन्न हुए परन्तु गौरी ने विवाह प्रस्ताव से मना करते हुए कहा कि उन्होंने तो भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में वरण किया है इसलिय वे किसी और से विवाह करने के बारे में सोच भी नहीं सकती।
गौरी की एक सखी के कहने पर गौरी ने अपने पिता का घर त्याग दिया और एक गुफा में भगवान शिव की उपासना में लीन हो गयी। गौरी ने गंगा की रेत से शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया और रात्रि में जागरण करते हुए शिव का स्तुतिगान किया। गौरी द्वारा की गयी पूजा-अर्चना से भगवान शिव प्रसन्न होकर उनके समक्स प्रकट हुए और उनसे वर मांगने को कहा। गौरी ने भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में मांग लिया। शिव के अंतर्ध्यान होने के बाद गौरी ने समस्त पूजा सामिग्री को गंगा में अर्पित करके व्रत का पारण किया। गौरी के पिता को जब उनकी तपस्या के बारे में जानकारी हुयी तो उन्होंने गौरी का विवाह भगवान शिव के साथ करने की सहर्ष अनुमति प्रदान करदी। समय आने पर शास्त्रोक्त विधि से भगवान शिव के साथ गौरी का विवाह संपन्न हो गया।
जिस दिन गौरी ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए व्रत और उपवास किया था उस दिन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी। तभी से ये तिथि हरतालिका तीज व्रत के रूप में मनई जाती है।
व्रत का माहात्म्य 
पुराणों के अनुसार जो सौभाग्यवती महिलाये इस व्रत को विधि-विधान से करती हैं उनका वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है। वहीं जो अविवाहित युवतियां इस व्रत को करके उपवास रखती हैं, उन्हें मनवांछित वार की प्राप्ति होती है तथा उनका विवाह भी शीघ्र होता है। इस व्रत को सभी महिलाये कर सकती हैं।  --- प्रमोद कुमार अग्रवाल