Tuesday, February 4, 2014

सौंदर्य और मादकता का प्रतीक है वसंत उत्सव

   माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का दिन ऋतुराज वसंत के आगमन के प्रथम दिवस के रूप में जाना जाता है। वसंत समस्त ऋतुओं का राजा है क्योंकि इन दिनों प्रकृति का अनुपम सौंदर्य देखते ही बनता है। बाग-बग़ीचों में पक्षिओं का कलरव, महकते-इठलाते रंग-बिरंगे पुष्पों पर भौंरों का गुंजन और वायुमंडल में अजीब सी मादकता का अनोखा अहसास- समस्त प्राणियों को प्रफुल्लित और मंत्रमुग्ध कर देता है।  वसंत ऋतु की यही मादकता जीव-जंतुओं में प्रेमालाप के रूप में नजर आने लगती है। इन दिनों कामदेव और रति की पूजा-अर्चना की जाती है जिससे कि दाम्पत्य जीवन में सुख और प्रेम का प्रादुर्भाव जीवन भर बना रहे। परन्तु "काम" को जीवन की अनिवार्यता मानने वालों के लिए यह पर्व चेतावनी भी देता है कि सौन्दर्यता के बाद पतझड़ भी आता है।  इसलिए जीवन में काम का उद्देश्य संतानोत्पत्ति तक ही सीमित रहे तो ही श्रेष्ट है। अन्यथा काम की अति जीवन के शीघ्र अंत की वजह बन सकती है।
    कहा जाता है कि वसंत ऋतू में भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण जी प्रत्यक्ष रूप से धरती पर प्रकट होते हैं और ब्रज में राधा और सखियों के साथ लीलाएं करते हैं।  इसीलिये सम्पूर्ण ब्रज में वसंत को एक उत्सव के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। वसंत पंचमी के दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ ज्ञान की देवी सरस्वती, विघ्नहर्ता गणेश, महादेव और सूर्यदेव आदि की आराधना की जाती है।  इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहने जाते हैं तथा भगवान की पूजा में भी पीले रंग के पुष्प, पीले रंग का चंदन और पीले रंग का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
   सिख धर्म के पवित्र गुरुग्रंथ साहब की वाणी में 31 शास्त्रीय रागों का प्रयोग हुआ है। इन्हीं रागों में से एक राग है राग वसंत। इन दिनों गुरुद्वारों में राग वसंत का मनोहारी कीर्तन श्रद्धालुओं के दिलों में भक्ति, स्नेह, प्रेम और श्रद्धा भाव जागृत कर देता है। वसंत पंचमी एक उत्सव मात्र ही नहीं है बल्कि शुरुआत है रंगों के पर्व होली की। ब्रज क्षेत्र में इस दिन चौराहों पर होलिका दहन हेतु लकड़ियों का एकत्रीकरण करते हुए फाग उड़ाना आरंभ हो जाता है जो पूरे एक माह फाल्गुन मास की पूर्णिमा तक चलता है।
   वसंत पंचमी का पर्व कृषक जगत से भी जुड़ा है।  इस दिन किसान भाई खेतों से उत्पन्न नए अनाज को गुड और शुद्ध घी के साथ मिश्रित करके अग्नि देव और पितृ देवों  को अर्पित करते हैं तथा आने वाले वर्षों में अधिक से अधिक फसल उत्पादन होने की कामना करते हैं।
   आनंद, प्रसन्नता, सुख, समृद्धि और अध्यात्म भावनाओं से जुड़ा वसंत पंचमी का पावन पर्व हमारे जीवन में त्याग और नवसृजन का समावेश करता है। वसंतोत्सव को सौंदर्य और कामोन्माद का पर्याय न मानते हुए आत्म जागृति एवं आत्म प्रेरणा प्रदान करने वाला पर्व माना चाहिए।  यह पर्व प्रकृति के करीब रहकर प्रकृति से समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए सीख लेकर समर्पित रहने की प्रेरणा देता है। -ज्योतिषविद् प्रमोद कुमार अग्रवाल,

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