Thursday, January 30, 2014

शुद्ध आहार का सेवन भी उपासना है

     शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए आहार का सेवन किया जाता है। धार्मिक दृष्टि से आहार शुद्ध और पवित्र होना आवश्यक है। उपनिषदों में कहा गया है कि "जैसा अन्न वैसा मन" अर्थात हम जैसा भोजन करते हैं, उसी के अनुसार हमारा मानसिक विकास होता है। मन की शुद्धता के लिए भोजन का शुद्ध और पवित्र होना अनिवार्य माना गया है।
    शुद्ध एवं उचित आहार भगवान की उपासना का एक अंग है। भोजन करते समय किसी भी अपवित्र खाद्य पदार्थ का ग्रहण करना निषिद्ध है। यही कारण है कि भोजन करने से पूर्व भगवान को भोग लगाने का विधान है जिससे कि हम केवल शुद्ध और उचित आहार ही ग्रहण करें।
    श्रीमद्भगवद् गीता के सत्रहवें अध्याय में भोजन के तीन प्रकारों, सात्विक, राजसिक एवं तामसिक का उल्लेख मिलता है। सात्विक आहार शरीर के लिए लाभकारी होते हैं और आयु, गुण, बल, आरोग्य तथा सुख की वृद्धि करते हैं। इस प्रकार के आहार में गौ घृत, गौ दुग्ध, मक्खन, बादाम, काजू, किशमिश आदि मुख्य हैं। राजसिक भोजन कड़वे, खट्टे, नमकीन, गरम, तीखे व रूखे होते हैं। इनके सेवन से शरीर में दुःख, शोक, रोग आदि उत्पन्न होने लगते हैं। इमली, अमचूर, नीबू, छाछ, लाल मिर्च, राई जैसे आहार राजसिक प्रकृति के माने गए हैं।
    तामसिक भोजन किसी भी दृष्टि से शरीर के लिए लाभकारी नहीं होते। बासी, सड़े-गले, दुर्गंधयुक्त, झूठे, अपवित्र और त्याज्य आहार तामस भोजन के अंतर्गत माने जाते हैं। मांस, अंडा, मछली, मदिरा, प्याज, लहसुन आदि आहार तामसिक होते हैं। इनके सेवन से मनुष्य की बुद्धि पर नकारात्मक असर पड़ता है। श्रीमद्भगवद् गीता के अनुसार सात्विक भोजन करने वाला दैवी संपत्ति का स्वामी होता है जबकि राजसिक और तामसिक भोजन करने वाला आसुरी संपत्ति का मालिक होता है।
     वास्तु शास्त्र के अनुसार भोजन सदैव पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करते हुए ही करना चाहिए।  चूँकि दक्षिण दिशा यम की दिशा होती है इसलिए इस दिशा की ओर मुख करके भोजन करना दोषपूर्ण है, इससे किया गया भोजन तन और मन दोनों को दूषित करता है तथा शक्ति का क्षय करता है।
     अथर्ववेद के अनुसार भोजन हमेशा भगवान को अर्पित करने के बाद ही करना चाहिए। भोजन करने से पूर्व हाथ व पैरों को स्वच्छ जल से अवश्य धो लेना चाहिए। भोजन करते समय मन को प्रसन्न और शांत रखना उचित माना जाता है। भोजन करने के दौरान क्रोध, लोभ, मोह तथा काम का चिंतन करने से किया गया भोजन शरीर को लाभ के बजाय नुक्सान ही पहुंचाता है।
    भोजन करने से पूर्व गौ ग्रास निकालने, भूखे व्यक्ति के आ जाने पर उसे भोजन कराने, अन्न का दान करने, जीव-जंतुओं को दाना-पानी देने और भोजन के समय भगवान का चिंतन करने एवं उनका नाम जपते हुए संतुष्ट भाव से भोजन करने से भगवान प्रसन्न होते हैं तथा ग्रह दोषों का शमन होता है।  --- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद्, आगरा 

Wednesday, January 15, 2014

प्रमोद अग्रवाल वास्तु विज्ञानविद् एवं मानव अधिकार समाज भूषण से सम्मानित

     भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थानम्, वाराणसी के सचिव डॉक्टर पुरुषोत्तम दास गुप्ता द्वारा वास्तु विज्ञान प्रशिक्षण शिविर में सहभागिता एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने पर कमला नगर आगरा निवासी ज्योतिषविद् प्रमोद  अग्रवाल को "वास्तु विज्ञानविद्" की उपाधि प्रदान कर सम्मानित किया गया है।  
     वहीं अंतर्राष्ट्रीय अकाडमी फॉर एस्ट्रोलॉजी, वास्तु, तंत्र-मन्त्र-यंत्र, अध्यात्म तथा गूढ़ शास्त्र रिसर्च सेंटर, पुणे के उपाध्यक्ष डॉक्टर विजय कुमार दाणी ने भी गत दिवस जबलपुर मध्य प्रदेश में संपन्न हुए एक समारोह में रचनात्मक कार्य और बहुमुखी प्रतिभा के लिए प्रमोद अग्रवाल को "मानव अधिकार भूषण" से सम्मानित किया है। 
     ज्योतिष विद्या विशारद में वाराणसी से  उपाधि प्राप्त प्रमोद अग्रवाल को इससे पूर्व भी "ज्योतिष दिग्विजयी" और "ज्योतिष कौमुदी" सम्मान से नवाजा जा चुका है। ज्योतिषविद् प्रमोद अग्रवाल धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष और वास्तु से जुड़े विभिन्न विषयों पर नियमित रूप से लेखन कर रहे हैं। 

Tuesday, January 14, 2014

पतंग और तिल गुड़ का त्यौहार है मकर संक्रांति

    जिस प्रकार हिंदू धर्म एवं संस्कृति में एक मास को शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष में विभाजित किया गया है, उसी प्रकार एक वर्ष को भी दो अयनों - उत्तरायण और दक्षिणायन में विभाजित किया गया है। उत्तरायण काल में सौर मंडल का सबसे सशक्त ग्रह सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा में परिवर्तन करते हुए थोड़ा उत्तर दिशा की और ढलता जाता है। जबकि दक्षिणायन में सूर्य पूर्व से थोड़ा दक्षिण को गमन करता है। सूर्य का उत्तरायण होना शुभ माना गया है। मकर संक्रांति का त्यौहार सूर्य की गति पर आधारित है। पौष मास में जब सूर्य धनु राशि को छोड़ कर मकर राशि पर आता है तब इस संक्रांति को मनाते हैं।
     पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन सूर्य देवता अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर स्वयं जाते हैं। शनि को मकर राशि का स्वामी ग्रह माना जाता है, इसलिए यह दिन मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। इसी दिन महाभारत काल के वीर प्रतापी योद्धा भीष्म पितामह ने अपने शरीर का त्याग किया और इसी दिन पवित्र गंगा नदी का धरती पर अवतरण होना माना जाता है।
    धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति अत्यंत महत्वपूर्ण त्यौहार है। चूंकि मकर संक्रांति खगोलीय घटना से जुड़ा है इसलिए इस त्यौहार से जड़ तथा चेतन वस्तुओं की दशा एवं दिशा का निर्धारण होता है। यह त्यौहार तन और मन में प्रसन्नता, उमंग और शांति का संचार करके मनुष्य को पुनर्जन्म के चक्र से अवमुक्त कर देता है। श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि उत्तरायण काल में जब सूर्य देव की कृपा से पृथ्वी विशेष प्रकाशमयी रहती है, तब मनुष्य शरीर का परित्याग होने से उसको पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता।
    मकर संक्रांति का त्यौहार पूरे देश में मनाया जाता है, परन्तु इसके नाम और स्वरुप अलग-अलग हैं। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल राज्यों में यह त्यौहार संक्रांति के नाम से तो तमिलनाडु राज्य में पोंगल के नाम से प्रसिद्ध है। पतंग और तिल गुड़ से जुड़े मकर संक्रांति के त्यौहार पर आसमान तरह-तरह की रंग-बिरंगी पतंगों से आच्छादित हो जाता है।
    मकर संक्रांति पर गंगा जैसी पवित्र नदियों में अथवा घर पर ही तिल मिश्रित जल से स्नान करना, शरीर पर तिल के तेल की मालिश करना, तिल युक्त हवन सामग्री से हवन करना, दाल-चावल की खिचड़ी, तिल और गुड़ या चीनी से बनी गजक अथवा मिष्ठान, गर्म वस्त्र, कंबल, रजाई एवं घरेलू उपयोग की वस्तुओं आदि का दान और सेवन करना शुभ माना जाता है।
    महाराष्ट्र में इस दिन विवाहित महिलाओं के हल्दी या रोली का तिलक लगाकर तिल व गुड़ से बने व्यंजन तथा श्रद्धानुसार उपहार देकर त्यौहार का आनंद लिया जाता है। कहते हैं कि मकर संक्रांति पर किये जाने वाले दान के शुभ प्रभाव से सूर्य, शनि और दूसरे दोषपूर्ण ग्रहों का कोई दुष्प्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता और जीवन में सुख, समृद्धि, शान्ति एवं संतान सुख प्राप्त होते हैं।-ज्योतिषविद् प्रमोद कुमार अग्रवाल,

Thursday, January 2, 2014

ग्रह बाधा में करें उपाय

++ अगर बनते हुए कार्यों में बिना वजह बाधा आ रही हो तो शुक्ल पक्ष के किसी भी मंगलवार से सुन्दर काण्ड का पाठ प्रारम्भ करके प्रतिदिन एक बार लगातार एक सौ आठ दिन तक पाठ करने से बाधा दूर होकर कार्य बनने लगते हैं। 
++ शनि की साढ़े साती परेशान कर रही हो तो कष्ट शमन के लिए शनि ग्रह से सम्बंधित मन्त्रों का जप करने के साथ-साथ शनि की वस्तुओं का दान करना चाहिए। 
++  सूर्य ग्रह के दोषपूर्ण होने से ह्रदय रोग की सम्भावना रहती है। इससे बचाव के लिए श्री आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। इस पाठ के करने से धन लाभ, प्रसन्नता, पदोन्नति तथा अन्य शुभ फल भी मिलते हैं। 
++ जीवन यापन के लिए पर्याप्त आय के साधन होने के बावजूद अगर लिया गया ऋण चुकता नहीं हो पा रहा है तो शुक्ल पक्ष के मंगलवार से व्रत रखते हुए ऋण मोचक मंगल स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। व्रत में नमक का सेवन न करें। 
++ यदि जीवन में लगातार दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ रहा हो तो प्रतिदिन महामृत्यंजय मन्त्र, विष्णुसहस्त्रनाम, राम रक्षा कवच और शक्ति कवच का जप करते हुए पशु-पक्षियों व मछली को दाना डालना चाहिए।
++ संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो तो अन्य उपायों के अलावा गौ पालन अथवा गौ सेवा करना शुभ होता है। गौ सेवा करने से जहां शुक्र ग्रह के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं वहीं प्रत्येक बुधवार को गौ माता को हरा चारा खिलाने से बुध ग्रह के दोषों का शमन होता है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष विद्या विशारद (फलित ज्योतिष और वास्तु सलाहकार) 

नया साल, हो नयी आशाएं

2013 बीत चुका है और हमारे सामने है एक और नया साल यानि 2014। जो बीत चुका है उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। बीते हुए साल में हमने क्या खोया, क्या नया हासिल किया, इस बात पर चिंतन-मनन करने का समय है। कहते हैं कि अतीत की घटनाओं से जो लोग सबक नहीं लेते, आने वाला समय उन्हें कभी माफ़ नहीं करता। इसलिए हमें बीते हुए समय से सबक लेकर नयी आशाओं और नए आत्म विश्वास के साथ इस नए साल का स्वागत करना चाहिए।
भारतीय धर्म और संस्कृति में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नए साल का शुभारंभ होना माना गया है। परंतु अँग्रेज़ी कलैंडर के अनुसार एक जनवरी से नया साल का आगाज होता है। इस तारीख से प्रारंभ होने वाले समय के आकलन को ईस्वी सन कहा जाता है। रोम के सम्राट जूलियस सीजर ईस्वी सन को ईसाई जगत के गॉड ईसा मसीह के जन्म के तीन साल बाद प्रचलन में लाये थे। हमारे देश में सन 1752 से ईस्वी संवत का प्रचलन अंग्रेजों द्वारा किया गया था।
प्रारंभ में ईस्वी सन 25 मार्च से शुरू होता था, परंतु अठारहवीं सदी में एक जनवरी से ईस्वी सन की शुरुआत की जाने लगी। पुराने कलैंडर में समय-समय पर आवश्यक सुधार किये जाते रहे। भारत में अंग्रेजों के द्वारा स्वीकृत ग्रेगर कलैंडर को राष्ट्रीय कलैण्डर के रूप में 22 मार्च, 1957 को अपनाने का निर्णय लिया गया। तभी से देश में सरकारी और गैरसरकारी काम-काज के लिए ग्रेगेरियन कलैण्डर की तारीखों का ही प्रयोग किया जा रहा है।
नया साल है तो मन में नयी उमंगें होना स्वाभाविक ही है। इस नए साल का स्वागत करने के लिए हमें कुछ नए ढंग से अपने को तैयार करना है। हम इस नए साल में नए संकल्प लें, अपने आप से ऐसे वादे करें, जिन्हें हम पूरे कर सकें। नए साल में मद्यपान, धूम्रपान, नशीले पदार्थों का सेवन करके हंगामा न करें और अगर अब तक करते रहे हों तो भविष्य में कभी भी न करने का दृढ़ संकल्प लें। अपनी शक्ति, धन और समय का सदुपयोग करने का वायदा करें। नए साल में ऐसा कोई भी काम न करें जिससे किसी को ज़रा भी कष्ट, तकलीफ और दुःख पहुंचे।
नए साल में नए दिन की शुरुआत किसी अच्छे काम से करनी चाहिए। अपने समय में से कुछ समय निकाल कर समाज और देश की सेवा करने के लिए भी अपने आप को अग्रसर रखना चाहिए। समाज में फ़ैली कुरीतियों को मिटाने की जिम्मेवारी हमारी ही है। नए साल में इन कुरीतियों को दूर करने का संकल्प लेते हुए दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
नया साल है तो नयी आशाओं के साथ हम स्वागत करें नए साल का। स्वागत करें नए साल के हर उस नए दिन का जो हमारे अंदर नयी ऊर्जा और नयी उमंग देता है। अपने पर्यावरण को संरक्षित करें, अपनी धरती को हरा-भरा बनाने के लिए नए साल पर नया पौधा लगाकर उसकी साल भर देख-रेख करें। पीने के पानी और बिजली के अपव्यय को रोकें। नए साल पर इस तरह से की गयी हमारी कोशिश निश्चय ही आने वाले दिनों में हमें सुख , प्रसन्नता और शांति प्रदान करती रहेगी।