Thursday, November 14, 2013

तुलसी विवाह कराने से मिलता है परम धाम

     कार्तिक मास में तुलसी पूजन को विशेष महत्त्व दिया गया है। तुलसी को भगवान् विष्णु की प्रिया माना जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी, दशमी तथा एकादशी तिथि को तुलसी का पूजन और व्रत  करके सुयोग्य ब्राह्मण को तुलसी का पौधा दान  करना शुभ फल प्रदान करने वाला माना गया है। इस मास में एकादशी तिथि के दूसरे दिन अर्थात द्वादशी तिथि को तुलसी विवाहोत्सव मनाया जाता है। 
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो मनुष्य कार्तिक मास में तुलसी को कन्या के रूप में स्वीकार हुए भगवान विष्णु को कन्यादान करके तुलसी विवाह संपन्न कराता है, उसे परम धाम की प्राप्ति होती है। कुछ श्रद्धालु एकादशी तिथि से कार्तिक की पूर्णिमा तक तुलसी का पूजन करते हैं और पूर्णिमा के दिन तुलसी विवाहोत्सव मनाते हैं। 
    धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से तुलसी को भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना में अनिवार्य माना जाता है। तुलसी दल के बिना शालिग्राम अथवा विष्णु शिला का पूजन अपूर्ण माना जाता है। 
    तुलसी को वृंदा भी कहा गया है। वृंदा जालंधर नाम के एक राक्षस की पतिव्रता पत्नी थी। राक्षस के अत्याचार का अंत करने के उद्देश्य से भगवान विष्णु ने छल करते हुए वृंदा का  पतिव्रत धर्म नष्ट कर दिया जिससे नाराज होकर उसने भगवान विष्णु को श्राप  दिया और स्वयं पति के शव के साथ सती हो गयी। तब विष्णु भगवान ने पश्चाताप स्वरुप वृंदा की चिता की भस्म में तुलसी, आंवला एवं मालती के वृक्ष लगाये। इसी तुलसी को भगवान विष्णु ने वृंदा के रूप में मान्यता दी और तुलसी पूजन तथा तुलसी विवाह को आवश्यक बताया। 
    ज्योतिष और वास्तु शास्त्र में तुलसी के बारे में कहा गया है कि जिस घर में तुलसी का वास होता है वहाँ गृह दोष और वास्तु दोष नहीं रहते। घर के आँगन में तुलसी का पौधा लगाकर प्रतिदिन उस पर जल अर्पित करके दीप जलाकर पूजन करने से घर में रोग, शत्रु भय, धनाभाव और बुरी आत्माओं का कोई प्रभाव नहीं होने पाता है। तुलसी आसपास के पर्यावरण को पूर्णतः कीटाणुमुक्त बनाये रखती है। इसलिए हमें अपने घर में अनिवार्य रूप से तुलसी लगानी चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल