Friday, August 23, 2013

भाग्य और पुरुषार्थ

मनुष्य के जीवन के साथ भाग्य और पुरुषार्थ दोनों ही जुड़े हैं. पुरुषार्थ अर्थात कर्मके बिना फल की प्राप्ति कदापि संभव नहीं है. पुरुषार्थ न करने वाले मनुष्य के पास लक्ष्मी का सदैव अभाव बना रहता है. कर्म करते रहने से ही समस्त कार्य पूर्ण होते हैं. लेकिन इसके बावजूद जीवन में भाग्य की प्रवलता भी बहुत महत्त्व रखती है. 
     जब भाग्य अनुकूल रहता है तब किया गया कोई भी कर्म अल्प प्रयास होने पर भी अधिक शुभ फल देता है, वहीँ दूसरी ओर भाग्य के प्रतिकूल होने पर किये गए समस्त प्रयास भी असफल हो जाते हैं और जीवन में अशुभ फल मिलने से नकारात्मकता हावी होने लगती है. 
      श्री मदभागवद गीता में कहा गया है कि किये गए कर्मों का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है.कर्म कभी निष्फल नहीं जाता। अच्छे कर्मों का फल शुभ तथा बुरे कर्मों का फल अशुभ ही होता है. 
     भाग्य को प्रबल और सुखी बनाने के लिए मनुष्य को हमेशा शुभ कर्म ही करने चाहिए, अपने बड़े-बुजुर्गों और गुरुजनों का सम्मान करना चाहिए तथा किसी भी जीव के प्रति हिंसा, अन्याय और अत्याचार करने से बचना चाहिए। इस जन्म में शुभ और सात्विक कर्मों द्वारा मनुष्य अपने को सुखी, संपन्न एवं सदाचारी बनाते हुए अगले जन्म को भी सुफल बना सकता है.-- प्रमोद कुमार अग्रवाल