Wednesday, April 17, 2013

भगवान के सच्चे भक्त बनने में है सुख

सर्वशक्तिमान ईश्वर अर्थात भगवान् की आराधना हम सब अपने-अपने ढंग से करते हैं और अपने को सच्चा भक्त कहते हैं। निहित स्वार्थ के लिए ईश्वर से प्रार्थना करना और परलोक सुधारने के लिए दिखावा करके नाम कमाने की अभिलाषा के साथ दान करना सच्ची भक्ति नहीं है। पुराणों में कहा गया  है कि जो मनुष्य संसार के समस्त प्राणिओं का हित करता है, अपनी इन्द्रिओं को वश में रखता है और जिसमें दूसरों के प्रति किंचित मात्र भी ईर्ष्या भाव भी नहीं है, भगवान् का सच्चा भक्त है। सत्यवादी सात्विक बुद्धि वाले, माता-पिता की सेवा करने वाले, निंदनीय कर्मों से दूर रहने वाले, साधु  पुरुषों के सेवक, मन वचन एवं कर्म से किसी को कष्ट न पहुँचाने वाले, और निष्काम भाव से शुभ कर्म करने वाले मनुष्य भगवान् को परम प्रिय हैं क्योंकि वे भगवान् के सच्चे भक्त हैं। -प्रमोद कुमार अग्रवाल