Tuesday, March 12, 2013

प्रसाद ग्रहण करें तो रखें ध्यान

विभिन्न धार्मिक एवं पारिवारिक अनुष्ठानों के समापन तथा देवी-देवताओं की पूजा आरती के पश्चात प्रसाद वितरण और प्रसाद ग्रहण करने का विशेष महत्त्व होता है। प्रसाद के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ भक्तों एवं श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित करने तथा प्रसाद ग्रहण करने से मन को असीम शान्ति एवं प्रसन्नता का अनुभव होता है। भगवान् के मंदिर में भी हम प्रसाद चढ़ाते हैं और वहां प्रसाद का कुछ भाग  उपस्थित श्रद्धालुओं को भी बांटते हैं। 
प्रसाद ग्रहण करने का सही तरीका हमें भगवान् की कृपा का पात्र बनता है। जब भी हमें किसी देवी-देवता के पूजन के उपरान्त प्रसाद प्राप्त हो, पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उन देवी-देवता का ध्यान लगाते हुए प्रसाद को अपने मस्तक से लगाकर प्रसन्न भाव से उसे ग्रहण करना चाहिए। प्रसाद को कभी भी ज़मीन पर नीचे नहीं गिराना चाहिए। प्रसाद को झूठा भी नहीं छोड़ना चाहिए। प्रसाद का भूल कर भी अपमान नहीं करना चाहिए। 
यदि व्रत, उपवास अथवा अन्य कारणों से प्रसाद ग्रहण न करना हो तो भी प्रसाद को ग्रहण करने से इन्कार नहीं करना चाहिए बल्कि दिया गया प्रसाद प्राप्त करके अपने पास रख लेना चाहिए। यदि प्रसाद की प्रकृति शीघ्र खराब होने वाली हो तो उसे किसी बच्चे या भक्त को दे देना चाहिए। 
प्रसाद के साथ तुलसी दल प्राप्त हो तो तुलसी दल को दांतों से चबाये बिना ग्रहण करना चाहिए। यदि किसी कारण से प्रसाद ज़मीन पर गिर गया हो तो तत्काल भगवान् से क्षमा याचना करते हुए प्रसाद को एकत्र कर गौ माता को खिला देना चाहिए। इस प्रकार एकत्र किये गए प्रसाद को बाहर फेंकना घोर पाप होता है। जानबूझ कर प्रसाद का तिरस्कार करना, पेरों से ठुकराना, प्रसाद ग्रहण करते समय अपवित्र  विचार रखना भी अनुचित माना जाता है। भगवान् के प्रति पूर्ण भक्ति-भाव और विश्वासपूर्ण आस्था रखते हुए प्रसाद ग्रहण करने वालों पर भगवान् की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा  इससे जीवन में सदैव शुभता आती है। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल