Tuesday, February 5, 2013

अशुभ स्वप्न दिखायी दें तो जपें मन्त्र

शयन करने के उपरांत स्वप्न देखना मनुष्य के जीवन की सामान्य गतिविधियों में शामिल हैं। स्वप्न दिन अथवा रात्रि में कभी भी दिखायी दे सकते हैं। देखे गए स्वप्न अच्छे अथवा बुरे होते हैं, जिन्हें ज्योतिष शास्त्र की भाषा में शुभ अथवा अशुभ कहा जाता है। दिन में देखे गए गए स्वप्न फल रहित होते हैं परन्तु रात्रि के प्रथम पहर में जो स्वप्न दिखायी देते हैं, उनका शुभ या अशुभ प्रभाव एक वर्ष की अवधि में मिलता है।
 प्रातः काल में स्वप्न देखने के बाद यदि जातक जाग जाता है और दोबारा शयन नहीं करता तो उसके देखे गए स्वप्न शीघ्र  फलदायी माने जाते हैं। यदि रात्रि में जातक एक से अधिक स्वप्न देखता है तो उसका अंतिम स्वप्न ही फलदायी होता है। अस्वस्थ, रोगी, असंयमी, चिंता एवं उन्मादग्रस्त, मूत्र और शौच के वेग के अधीन देखे गए स्वप्न व्यर्थ होते हैं। 
शुभ तथा अशुभ स्वप्नों की अवधारणा देखे गए स्वप्न के प्रकार पर निर्भर होती है। स्वप्न में कबूतर, गिद्ध, श्वान, सियार, मुर्गा, बिलाव, सर्प, कबूतर, सूखा हुआ पेड़, पर्वत, पत्थर, शिखर, ध्वजा, भस्म एवं अंगारे, जल में डूबना, सूर्य या चन्द्र ग्रहण, सूखी नदी, दलदल, बंद द्वार, धुंआ, सुराही, केंची, काले वस्त्र धारण करने वाली महिला के साथ प्रेम प्रदर्शन, दांत  घिसना, हँसता हुआ साधू और सन्यासी, राक्षस की आकृति, मरण दृश्य, किसी वस्तु की चोरी, मिष्ठान और पकवान का सेवन करना आदि देखना अशुभ माना गया है।
 कहा जाता है कि  अशुभ स्वप्न देखने के बाद यदि जातक रात्रि में ही किसी को उस स्वप्न के बारे में बता दे तथा दोबारा शयन  करे तो ऐसा अशुभ स्वप्न जातक के लिए अनिष्टकारी नहीं होता है। प्रातः उठकर यदि अशुभ स्वप्न की चर्चा तुलसी के पौधे के समक्ष कर दी जाये तो भी उस अशुभ स्वप्न का दुष्प्रभाव नहीं होता है। 
यदि जातक अक्सर ही अशुभ स्वप्न देखता रहता है तो इसके निवारण के लिए अशुभ स्वप्न निवारण मन्त्र "" ॐ ह्वीं श्रीं क्लीं पूर्वदुर्गतिनाशिन्ये महामायाये स्वाहा "" का प्रतिदिन स्नान आदि करने के उपरांत शुद्ध चित्त भाव से कम से कम ग्यारह बार जाप करना चाहिए। इसके अलावा अशुभ स्वप्न से छुटकारा पाने के लिए श्री गजेन्द्रमोक्ष स्त्रोत का पाठ करना भी शुभ रहता है। रात्रि में शयन करने से पूर्व ईश्वर की आराधना करना और शांत चित्त होकर ध्यान लगाना भी जातक को अशुभ स्वप्न देखने से बचाता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल 

हथेली में त्रिभुज बनता है भाग्यशाली

हथेली में बनी विभिन्न रेखाएं, पर्वतों की स्थिति, चिन्ह और अन्य संकेतों के अध्ययन से जातक के बारे में जानकारी दी जा सकती है। हथेली में जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा और स्वास्थ्य रेखा के बीच का स्थान त्रिभुज कहलाता है। इन तीनों रेखाओं की स्थिति के अनुसार त्रिभुज छोटा, बड़ा, विस्तृत, संकुचित अथवा अन्य विशेषताएँ लिए हो सकता है। 
यदि किसी जातक की हथेली में ये रेखाएं न भी हों, तो भी त्रिभुज के स्थान को आधार मानकर अध्ययन किया जाता है। हथेली में यदि त्रिभुज बड़े आकर का हो तो जातक उदार, संपन्न और दीर्घ  आयु वाला होता है।
त्रिभुज के साथ मंगल पर्वत का उभार युक्त होना जातक को स्पष्टवादी बनाता है। वहीँ छोटा, दबा हुआ और आड़ी रेखाओं वाला त्रिभुज जातक को कंजूस, भयभीत होने वाला, चिडचिडा एवं क्रोधी बनता है।यदि त्रिभुज में बने कोण स्पष्ट और अच्छे हों तो जातक लम्बी आयु वाला और बुद्धिमान होता है। उसकी निर्णय लेने की क्षमता भी अद्वितीय होती है।त्रिभुज का दूसरा कोण यदि चन्द्र पर्वत पर बना दिखाई दे तो जातक के मानसिक रोगों से ग्रसित होने की संभावनाएं रहती हैं। त्रिभुज में अन्दर की ओर श्वेत रंग के बिंदु होना जातक में रक्त की कमी दर्शाता है।वहीँ लाल बिन्दुओं की मौजूदगी महिलाओं के गर्भवती होने का संकेत देती  है। 
अगर त्रिभुज के बीच क्रौस का चिन्ह बना हो तो जातक झगडालू प्रवृत्ति का होता है। एक से अधिक क्रौस का होना आर्थिक विपन्नता की ओर इशारा करते हैं।जीवन और भाग्य रेखा के बीच बना त्रिभुज जातक को साहसी एवं प्रसिद्धि प्रदान करता है। 
यदि त्रिभुज के मध्य में वर्ग का चिन्ह हो तो जातक के जीवन में खतरे आने की आशंकाएं बनी रहती हैं। त्रिभुज में यदि वृत्त हो तो जातक को विपरीत लिंग वाले व्यक्ति से तनाव 
और कष्ट मिलता है। त्रिभुज में गहरा जाल अशुभ माना जाता है। -- प्रमोद
कुमार अग्रवाल