Friday, January 11, 2013

जब सताए केतु तो करें उपाय

केतु भी एक अशुभ एवं पापी ग्रह  माना गया है। परन्तु शुभ स्थिति में होने पर केतु ग्रह  अन्य ग्रहों की तुलना में श्रेष्ठ फल प्रदान करता है। केतु के कुपित होने पर जातक के व्यवहार में विकार आने लगते हैं, काम वासना तीव्र होने से जातक दुराचार जैसे दुष्कृत्य करने की ओर उन्मुख हो जाता है। इसके अलावा केतु ग्रह  के अशुभ प्रभाव से गर्भपात, पथरी, गुप्त एवं असाध्य रोग, खांसी, सर्दी, वात और पित्त विकार जन्य  रोग, पाचन संबंधी रोग आदि होने का अंदेशा रहता है।
 वहीँ दूसरी ओर केतु ग्रह  के अशुभ प्रभाव से जातक के जीवन में मुकदमेबाजी, झगडा, वैवाहिक जीवन में अशान्ति, पिता से मतभेद होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। जन्म कुंडली के लग्न, षष्ठम, अष्ठम तथा एकादश भाव में केतु की स्थिति को शुभ नहीं माना गया है। इसके कारण जातक के जीवन में अशुभ प्रभाव ही देखने को मिलते हैं। उसका जीवन संघर्ष एवं कष्टपूर्ण स्थिति में बना रहता है। भूत-प्रेत बाधाएं भी जातक को परेशान करती हैं।
केतु के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए जातक को लाल चन्दन की माला को अभिमंत्रित कराकर शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार को धारण करना चाहिए। केतु के मन्त्र "" पलाश पुष्प संकाशं, तारका ग्रह मस्तकं। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं, तम केतुम प्रण माम्य्हम "  से अभिमंत्रित असगंध की जड़ को नीले धागे में शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार को धारण करने से भी केतु ग्रह  के अशुभ प्रभाव कम होने लगते हैं। केतु ग्रह की शांति के लिए तिल, कम्बल, कस्तूरी, काले पुष्प, काले वस्त्र, उड़द की काली दाल, लोहा, कली छतरी आदि का दान भी किया जाता है। केतु के रत्न लहसुनिया को शुभ मुहूर्त में धारण करने से भी केतु ग्रह  के अशुभ प्रभाव से बचा जा सकता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल