Thursday, November 28, 2013

फंक्शन उनका, मुसीबत दूसरों की

शादी-ब्याह का सीजन चल रहा है। जिसके लिए मैरिज होम, पार्क, सड़क, गली, खुला स्थान जो भी खाली मिल जाए बड़े आराम से उपयोग में ले लिया जाता है। वैसे किसी सार्वजनिक सामाजिक या धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजन में भी ये जगह उपलब्धता के आधार पर प्रयोग की जाती हैं। मैरिज होम को छोड़कर अन्य जगह के लिए कोई किराया भी देने की ज़रुरत नहीं होती। 
यद्यपि विवाह समारोह जैसे आयोजन निजी माने जाते हैं लेकिन इनमें भव्यता को जगह देकर अपनी हैसियत का प्रदर्शन किया जाता है। वहीं इन आयोजनों के दौरान वाहनों की वजह से जाम, कनफोडू आवाज में बेंड-बाजों, वाद्य यंत्रों व गीत-संगीत सहित गायकों की आवाज, लगातार चलने वाली आतिशबाजी देर रात गए तक लोगों की नींद हराम किये रहती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार सार्वजनिक मार्ग और पार्कों आदि में इस तरह के आयोजन तथा रात दस बजे के बाद किसी तरह का शोर प्रतिबंधित है। 
आयोजक तो अपने इस कृत्य के लिए न्यायालय की अवमानना के लिए जिम्मेदार हैं ही, पुलिस और प्रशासन के अधिकारी भी कम जिम्मेदार नहीं हैं जो जान-बूझकर इसे नजर अंदाज किये बैठे रहते हैं। निजी कार्यक्रमों में इस तरह के दिखावे की मानसिकता समझ से परे है। निजी कार्यक्रम के आयोजन तो इस प्रकार होने चाहिए कि उसमें शामिल होने वालों के अलावा किसी और को पता ही न चले कि कोई कार्यक्रम हो भी रहा है। निजी या सार्वजनिक कार्यक्रमों के नाम पर अनावश्यक शोर-शराबा करने वाले आयोजक शायद ये भूल जाते हैं कि उनकी वजह से कितने लोगों को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्ट से गुजरना पड़ता है। 
इस बात का अहसास उन्हें उस वक़्त अवश्य ही होता होगा जब उनके आस-पास भी कोई और इस तरह का फंक्शन आयोजित कर रहा हो। फंक्शन करना आलोचना का कारण नहीं है बल्कि उस के नाम पर दूसरों के लिए मुसीबत पैदा करना है। फंक्शन चाहे निजी हो या सार्वजनिक उन्हें पूरी सादगी और शालीनता के साथ इस तरह मनाना चाहिए जिससे किसी भी अन्य व्यक्तिओं को कोई  कष्ट या परेशानी का सामना न करना पड़े। --प्रमोद कुमार अग्रवाल

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