Thursday, October 31, 2013

अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है पंच महोत्सव पर्व दीपावली

भारतीय धर्म और संस्कृति में तीज त्योहारों के आयोजन को विशेष महत्त्व दिया गया  है ये त्यौहार हमारे अन्दर नव उत्साह का संचार तो करते ही हैं, राष्ट्रीय एकता और सद्भावना को भी मजबूत बनाते हैं कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से लेकर इसी मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि तक पांच दिवसीय दीपावली पर्व मनाया जाता है इसे पंच महोत्सव भी कहते हैं। सुख, समृद्धि, ज्ञान, आरोग्य और दीर्घायु प्रदान करने वाले इस पंच दिवसीय महोत्सव में पहले दिन धनतेरस, दूसरे दिन नरक चतुर्दशी, तीसरे दिन  दीपावली, चौथे दिन गोवर्धन पूजा और पांचवे व अंतिम दिन यम द्वितीया या भाई दूज का त्यौहार मनाया जाता है पांच दिनों तक चलने वाले इस अद्भुत पर्व पर प्रत्येक दिन सांध्य काल से लेकर रात्रि तक दीप जलाकर दीपदान करना अनिवार्य बताया  गया है
  धनतेरस : कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस होती है धनतेरस से दीपोत्सव का आगाज हो जाता है इस दिन मृत्यु के देवता यमराज को प्रसन्न करने के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करते हुए उनकी पूजा करके सायंकाल आटे का दीपक जलाया जाता है पुराणों के अनुसार इस दिन आरोग्य और आयु के देवता भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन इनका पूजन भी किया जाता है और चांदी या अन्य धातु के नए बर्तन भी खरीदे जाते हैं। धनतेरस के दिन दीपदान करते समय "मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सहा त्रयोदश्यां  दीपदानात्सूर्यजः प्रीतयामिति।" मन्त्र का जप करना चाहिए। 
नरक चतुर्दशी : धनतेरस के दूसरे दिन नरक चतुर्दशी मनाई जाती है।  इसे रूप चौदस अथवा छोटी दीपावली भी कहते हैं। कहते हैं कि इस दिन श्री कृष्ण भगवान ने नरकासुर नाम के दैत्य को मारकर ब्रजवासियों को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी। नरकासुर के मरने की खुशी में इस दिन दीपक जलाकर उत्सव मनाया गया था। नरक गमन से बचने के लिए इस अवसर पर प्रातः काल में आटा, सरसों का तेल और हल्दी का उबटन शरीर पर लगाते हैं और अपामार्ग पौधे की पत्तियां पानी में डालकर स्नान करते हैं। इस अवसर पर "सीता लष्टि सहायुक्तः संकश्टक दलान्वितः।  हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाण पुनः पुनः।" मन्त्र का जप करने से दरिद्रता और कष्टों का नाश होता है। 
दीपावली : पंच महोत्सव के तीसरे दिन दीपावली का मुख्य त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम चौदह वर्ष के वनवास की अवधि पूरी करके अयोध्या लौटे थे तथा उनका राज्याभिषेक होने की खुशी में अयोध्या को दीपकों के प्रकाश से सजाया गया था और खुशियाँ मनाई गयी थीं। इस दिन जैन मत के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर, महर्षि दयानंद सरस्वती और स्वामी राम तीर्थ ने निर्वाण प्राप्त किया था।  भगवान श्री कृष्ण भी दीपावली के दिन शरीर से मुक्त हुए थे।  दीपावली का पर्व प्रकाश का पर्याय है क्योंकि इस दिन धन की महादेवी लक्ष्मी जी, श्री गणेश जी के साथ-साथ ज्ञान की देवी सरस्वती जी की पूजा अर्चना की जाती है। धन, ज्ञान और विद्या प्राप्त करने के लिए दीपावली से श्रेष्ठ कोई दूसरा पर्व नहीं हो सकता है। कार्तिक अमावस्या को मनाई जाने वाली दीपावली पर घोर अन्धकार को दीपक जलाकर दूर किया जाता है। ये दीपक घरों में, तुलसी व पीपल वृक्ष पर जलाए जा सकते हैं।  दीप जलाते समय "शुभम करोति कल्याणं आरोग्य धन संपदा। शत्रु बुद्धि विनाशयः दीप ज्योति नमोस्तुते। " मन्त्र का जप अवश्य करना चाहिए। दीपावली की रात जागरण करके लक्ष्मी जी की साधना भी की जाती है 
गोवर्धन पूजा : दीपावली के दूसरे दिन अन्न कूट अर्थात गोवर्धन पूजा पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान् श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का ज्ञान दिया था।  गौ माता के गोबर से गोवर्धन महाराज की प्रतिमा बनाकर रोली, अक्षत, मिष्ठान, खीर, पुष्प आदि से उनकी पूजा अर्चना करके परिक्रमा लगाई जाती है तथा दीपदान करके भगवान श्री कृष्ण एवं लक्ष्मी जी से सभी के कल्याण की  कामना की जाती है। गोवर्धन पूजा के समय "गोवर्धन धराधर गोकुल त्राणकारक।  विष्णु बाहुकृतोकच्छराय गवां कोटिप्रदो भव। "मन्त्र का जप करना चाहिए। गोवर्धन पूजा धार्मिक मान्यता से तो जुड़ा है ही, पर्यावरण की सुरक्षा का भी सन्देश देता है 
भई दूज : पंच महोत्सव के पांचवे और अंतिम दिन भाई दूज का पर्व मनाया जाता है।  इसे यम द्वितीया के रूप में भी जाना जाता है। कहते हैं इस दिन यम देवता ने अपनी बहन यमी को दर्शन दिए थे यमी के द्वारा किये गए आदर सत्कार से प्रसन्न होकर यम ने बहन को यह वरदान दिया कि जो भाई-बहन आज अर्थात कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को एक साथ पवित्र  यमुना नदी में स्नान करेंगे तो उनकी मुक्ति हो जायेगी।  इस दिन बहन अपने भाई के तिलक लगाकर स्नेह-प्रेम की अभिव्यक्ति करती हैं। बदले में भाई अपनी बहन को उपहार आदि प्रदान करते हैं।  भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से जुड़े इस अद्भुत पर्व के मर्म को समझना चाहिए और निहित स्वार्थ के लिए इस रिश्ते को कलंकित होने से बचाना चाहिए।
कार्तिक मास में पांच दिनों तक मनाये जाने वाले इस महोत्सव के प्रभाव से जीवन में धन सुख, स्वास्थ्य सुख, शांति, सद्भाव और सम्पन्नता प्राप्त होने के साथ-साथ स्नेह-प्रेम का भी संचार होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल




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