Thursday, October 31, 2013

अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है पंच महोत्सव पर्व दीपावली

भारतीय धर्म और संस्कृति में तीज त्योहारों के आयोजन को विशेष महत्त्व दिया गया  है ये त्यौहार हमारे अन्दर नव उत्साह का संचार तो करते ही हैं, राष्ट्रीय एकता और सद्भावना को भी मजबूत बनाते हैं कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से लेकर इसी मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि तक पांच दिवसीय दीपावली पर्व मनाया जाता है इसे पंच महोत्सव भी कहते हैं। सुख, समृद्धि, ज्ञान, आरोग्य और दीर्घायु प्रदान करने वाले इस पंच दिवसीय महोत्सव में पहले दिन धनतेरस, दूसरे दिन नरक चतुर्दशी, तीसरे दिन  दीपावली, चौथे दिन गोवर्धन पूजा और पांचवे व अंतिम दिन यम द्वितीया या भाई दूज का त्यौहार मनाया जाता है पांच दिनों तक चलने वाले इस अद्भुत पर्व पर प्रत्येक दिन सांध्य काल से लेकर रात्रि तक दीप जलाकर दीपदान करना अनिवार्य बताया  गया है
  धनतेरस : कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस होती है धनतेरस से दीपोत्सव का आगाज हो जाता है इस दिन मृत्यु के देवता यमराज को प्रसन्न करने के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करते हुए उनकी पूजा करके सायंकाल आटे का दीपक जलाया जाता है पुराणों के अनुसार इस दिन आरोग्य और आयु के देवता भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन इनका पूजन भी किया जाता है और चांदी या अन्य धातु के नए बर्तन भी खरीदे जाते हैं। धनतेरस के दिन दीपदान करते समय "मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सहा त्रयोदश्यां  दीपदानात्सूर्यजः प्रीतयामिति।" मन्त्र का जप करना चाहिए। 
नरक चतुर्दशी : धनतेरस के दूसरे दिन नरक चतुर्दशी मनाई जाती है।  इसे रूप चौदस अथवा छोटी दीपावली भी कहते हैं। कहते हैं कि इस दिन श्री कृष्ण भगवान ने नरकासुर नाम के दैत्य को मारकर ब्रजवासियों को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी। नरकासुर के मरने की खुशी में इस दिन दीपक जलाकर उत्सव मनाया गया था। नरक गमन से बचने के लिए इस अवसर पर प्रातः काल में आटा, सरसों का तेल और हल्दी का उबटन शरीर पर लगाते हैं और अपामार्ग पौधे की पत्तियां पानी में डालकर स्नान करते हैं। इस अवसर पर "सीता लष्टि सहायुक्तः संकश्टक दलान्वितः।  हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाण पुनः पुनः।" मन्त्र का जप करने से दरिद्रता और कष्टों का नाश होता है। 
दीपावली : पंच महोत्सव के तीसरे दिन दीपावली का मुख्य त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम चौदह वर्ष के वनवास की अवधि पूरी करके अयोध्या लौटे थे तथा उनका राज्याभिषेक होने की खुशी में अयोध्या को दीपकों के प्रकाश से सजाया गया था और खुशियाँ मनाई गयी थीं। इस दिन जैन मत के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर, महर्षि दयानंद सरस्वती और स्वामी राम तीर्थ ने निर्वाण प्राप्त किया था।  भगवान श्री कृष्ण भी दीपावली के दिन शरीर से मुक्त हुए थे।  दीपावली का पर्व प्रकाश का पर्याय है क्योंकि इस दिन धन की महादेवी लक्ष्मी जी, श्री गणेश जी के साथ-साथ ज्ञान की देवी सरस्वती जी की पूजा अर्चना की जाती है। धन, ज्ञान और विद्या प्राप्त करने के लिए दीपावली से श्रेष्ठ कोई दूसरा पर्व नहीं हो सकता है। कार्तिक अमावस्या को मनाई जाने वाली दीपावली पर घोर अन्धकार को दीपक जलाकर दूर किया जाता है। ये दीपक घरों में, तुलसी व पीपल वृक्ष पर जलाए जा सकते हैं।  दीप जलाते समय "शुभम करोति कल्याणं आरोग्य धन संपदा। शत्रु बुद्धि विनाशयः दीप ज्योति नमोस्तुते। " मन्त्र का जप अवश्य करना चाहिए। दीपावली की रात जागरण करके लक्ष्मी जी की साधना भी की जाती है 
गोवर्धन पूजा : दीपावली के दूसरे दिन अन्न कूट अर्थात गोवर्धन पूजा पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान् श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का ज्ञान दिया था।  गौ माता के गोबर से गोवर्धन महाराज की प्रतिमा बनाकर रोली, अक्षत, मिष्ठान, खीर, पुष्प आदि से उनकी पूजा अर्चना करके परिक्रमा लगाई जाती है तथा दीपदान करके भगवान श्री कृष्ण एवं लक्ष्मी जी से सभी के कल्याण की  कामना की जाती है। गोवर्धन पूजा के समय "गोवर्धन धराधर गोकुल त्राणकारक।  विष्णु बाहुकृतोकच्छराय गवां कोटिप्रदो भव। "मन्त्र का जप करना चाहिए। गोवर्धन पूजा धार्मिक मान्यता से तो जुड़ा है ही, पर्यावरण की सुरक्षा का भी सन्देश देता है 
भई दूज : पंच महोत्सव के पांचवे और अंतिम दिन भाई दूज का पर्व मनाया जाता है।  इसे यम द्वितीया के रूप में भी जाना जाता है। कहते हैं इस दिन यम देवता ने अपनी बहन यमी को दर्शन दिए थे यमी के द्वारा किये गए आदर सत्कार से प्रसन्न होकर यम ने बहन को यह वरदान दिया कि जो भाई-बहन आज अर्थात कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को एक साथ पवित्र  यमुना नदी में स्नान करेंगे तो उनकी मुक्ति हो जायेगी।  इस दिन बहन अपने भाई के तिलक लगाकर स्नेह-प्रेम की अभिव्यक्ति करती हैं। बदले में भाई अपनी बहन को उपहार आदि प्रदान करते हैं।  भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से जुड़े इस अद्भुत पर्व के मर्म को समझना चाहिए और निहित स्वार्थ के लिए इस रिश्ते को कलंकित होने से बचाना चाहिए।
कार्तिक मास में पांच दिनों तक मनाये जाने वाले इस महोत्सव के प्रभाव से जीवन में धन सुख, स्वास्थ्य सुख, शांति, सद्भाव और सम्पन्नता प्राप्त होने के साथ-साथ स्नेह-प्रेम का भी संचार होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल




आरोग्य और धन के लिए करें धन्वन्तरि की पूजा

    कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धन त्रयोदशी या धनतेरस के रूप में मनाया जाता है इस तिथि से पाँच दिनों तक मनाये जाने वाले प्रकाश पर्व दीपावली का शुभारम्भ हो जाता है इस दिन देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि समुद्र से अमृत कलश लेकर आये थे, इसलिए इस दिन को धन्वन्तरि जयंती के रूप में जाता है 
    धनतेरस के दिन जल, रोली, अक्षत, गुड़, पुष्प, नैवेद्य आदि से वैदिक देवता यमराज का पूजन किये जाने का विधान है इसके अलावा आटे का बना दीपक सरसों का तेल और रुई की चार बत्तियां डालकर घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर जलाया जाता है इसे यमराज के लिए दीपदान माना जाता है ऐसा करने से घर के सदस्यों को अकाल मृत्यु का कोई भय नहीं रहता, यह शास्त्रों में वर्णित है
  धनतेरस के दिन जहाँ एक ओर वैद्य और हकीम भगवान धन्वन्तरि की पूजा अर्चना करते हैं वहीं घर-परिवारों में पुराने और टूटे-फूटे बर्तनों को बदलना, नए बर्तन और चांदी के सिक्के खरीदना शुभ समझा जाता है 
    धनतेरस की महत्ता के सम्बन्ध में प्रचलित एक कथा के अनुसार एक बार भगवान् विष्णु ने लक्ष्मीजी को नाराज होकर बारह वर्ष तक पृथ्वी लोक पर एक किसान के घर रहकर उसकी सेवा करने की श्राप दे दिया। लक्ष्मीजी के आशीर्वाद से किसान का घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया समय पूरा होने पर जब विष्णु भगवान् लक्ष्मीजी को लेने आये तो किसान ने उन्हें जाने से रोका। विष्णुजी ने किसान को समझाते हुए श्राप के बारे बताया और कहा कि चंचल स्वभाव की लक्ष्मीजी को कोई एक स्थान पर नहीं रोक सकता, तुम्हारा हठ करना निरर्थक है
    विष्णुजी की बात सुनकर लक्ष्मीजी ने किसान से कहा कि अगर तुम मुझे अपने यहाँ रोकना चाहते हो तो तुम धनतेरस वाले दिन घर को स्वच्छ रखना और रात्रि में घी  का दीपक जलाकर प्रकाश बनाए रखना। किसान ने लक्ष्मीजी के कहे अनुसार धनतेरस की रात्रि में दीपक जलाया और उनकी पूजा भी की लक्ष्मीजी की कृपा से किसान के घर धन-धान्य के भण्डार भर गए 
    धनतेरस के अवसर पर कही जाने वाली एक अन्य कथा के अनुसार, प्राचीन समय में हिम नाम के एक राजा के यहाँ पुत्र संतान की प्राप्ति हुई तो ज्योतिषियों ने यह भविष्यवाणी की कि इसकी मृत्यु विवाह के चौथे दिन सर्प के काटने से हो जायेगी। सोलह वर्ष की आयु में राजकुमार का विवाह एक राजकन्या के साथ हुआ राजकन्या को जब राजकुमार की मृत्यु के बारे में जानकारी हुई तो उसने विवाह के चौथे दिन सर्प के आने के सभी संभावित मार्गों पर हीरे-जवाहरात बिछाते हुए पूरे घर को प्रकाशमय बना दिया और स्वयं राजकुमार को भक्ति गीत सुनाने लगी। निर्धारित समय पर यम देवता सर्प का रूप धारण करके राजमहल में आये, परन्तु हीरे-जवाहरात के तेज प्रकाश एवं राजकुमारी के गीत-संगीत के कारण वे मन्त्र-मुग्ध होकर एक स्थान पर बैठ गए उन्हें प्रातः काल होने का पता ही नहीं चला विवश होकर यमराज को राजकुमार के प्राण लिए बिना ही वापस लौटना पड़ा जिस दिन राजकुमारी ने अपनी सूझ-बूझ से राजकुमार को यमराज के पंजे से बचाया उस दिन धनतेरस थी। इसलिए इस दिन यमराज से बचने के लिए दीपदान करने के साथ-साथ घर में पूरी रात्रि प्रकाश रखा जाता है 
    धनतेरस पर घरों के अलावा कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में देव मंदिर, पवित्र नदी के तट, गौशाला, बावली, कुआं, पीपल, तुलसी, वट वृक्ष, आंवला आदि के समीप तीन दिनों तक दीपक प्रज्वलित किये जाने का भी  विधान है तुला राशि के सूर्य में चतुर्दशी और अमावस्या के सांध्य काल में एक लकड़ी की मशाल बनाकर उसे जलाने से पितरों का मार्ग प्रशस्त होता है जिससे पितर प्रसन्न होकर अपना शुभ आशीर्वाद देते हैं और अकाल मृत्यु से हमारी रक्षा करते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल 

Tuesday, October 22, 2013

सौभाग्य और संतान देने वाला है करवा चौथ का व्रत

    पति के स्वास्थ्य, लम्बी आयु, और सौभाग्य के साथ-साथ संतान सुख प्राप्त करने के लिये विवाहित महिलाओं द्वारा करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को होता है। इस दिन महिलायें निर्जला व्रत रखते हुये शाम को व्रत के महात्म की कथा सुनती हैं और रात में चंद्रमा निकलने पर उसे अर्घ्य देकर भोजन करके व्रत का परायण करती हैं।
     करवा चौथ का व्रत रखने वाली महिलाओं द्वारा मिलकर व्रत की कथा सुनते समय चीनी अथवा मिट्टी के करवे का आदान-प्रदान किया जाता है तथा घर की बुजुर्ग महिला जैसे ददिया सास, सास, ननद या अन्य सदस्य को बायना, सुहाग सामग्री, फल, मिठाई, मेवा, अन्न, दाल आदि एवं धनराशि देकर और उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लिया जाता है। इस व्रत में भगवान शिव शंकर, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्र देवता की पूजा अर्चना करने का विधान है।
     करवा चौथ के संबंध में एक कथा का उल्लेख मिलता है। प्राचीनकाल में एक धर्मपरायण साहूकार के सात बेटे तथा एक बेटी थी। बडी होने पर बेटी का विवाह हो गया। विवाह के बाद जब वह अपने मायके आई तो करवा चौथ का दिन भी पडा। उसने उस दिन निर्जला व्रत रखा। चंद्रमा निकलने से पहले ही उसे भूख सताने लगी। भूख के कारण उसका कोमल चेहरा मुरझाने लगा। बहन की यह दशा देखकर उसके भाईयो ने एक दीपक जलाकर छलनी से ढकते हुये नकली चंद्रमा बनाया और बहन ने बोले कि चांद निकल आया है, अर्घ्य देकर व्रत खोल लो। अपने भाईयो की बात पर विश्वास करके बहन ने चंद्रमा को अर्घ्य दे  दिया और भोजन कर लिया । भोजन के  समय उसके ग्रास में बाल और कंकड निकले। उसकी ससुराल से पति के गंभीर बीमार होने का समाचार भी आ गया। वह तत्काल मायके से विलाप करती हुई अपनी ससुराल के लिये चल पडी।
     दैवयोग ऐसा रहा कि उसी समय इन्द्राणी देवदासियो के साथ आकाश मार्ग से निकाल रही थी। उसने विलाप करती बहन को देखा तो वह उसके पास आ गई  और विलाप करने का कारण पूछा। कारण जानने के बाद इन्द्राणी ने कहा कि तुमने करवा चौथ के व्रत में चन्द्रमा निकलने से पहले ही अन्न-जल ग्रहण कर लिया था, इस कारण ही तुम्हारे पति की यह दशा हो गई है। अपने पति के प्राणो की रक्षा के लिए तुम्हें एक वर्ष तक हर माह चतुर्थी तिथि को व्रत रखते हुए पति की सेवा करनी होगी। करवा चौथ वाले दिन निर्जल व्रत रखकर विधि-विधान से गौरा पार्वती, भगवान शिव, कार्तिकेय और गणेश की पूजा करके और रात्रि में चन्द्र दर्शन के बाद अर्घ्य देकर ही अन्न-जल ग्रहण करने से तुम्हें तुम्हारा सुहाग वापस मिल जाएगा।
     इन्द्राणी के कहे अनुसार उस कन्या ने एक वर्ष तक पूरे मनोयोग से अपने पति की सेवा की, हर माह की चतुर्थी तिथि को नियम धर्म से व्रत रखते  हुए करवा चौथ के दिन निर्जला व्रत रखा और रात्रि में चन्द्रमा निकलने पर उसे अर्घ्य देकर व्रत का परायण किया। उसके द्वारा चौथ माता से अपनी भूल के लिए क्षमा याचना करते हुए पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना भी की गई. इससे चौथ माता ने प्रसन्न होकर उसके पति को स्वस्थ कर दिया।
     करवा चौथ की यह कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है, उनके घर में सुख, शान्ति,समृद्धि और सन्तान सुख मिलता है। महाभारत में भी करवा चौथ के महात्म पर एक कथा का उल्लेख मिलता है, जिसके अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने द्रोपदी को करवा चौथ की यह कथा सुनाते हुये कहा था कि पूर्ण श्रद्धा और विधि पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-सौभाग्य तथा धन-धान्य की प्राप्ति होने लगती है। श्री कृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रोपदी ने भी करवा चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही अर्जुन सहित पांचो पाण्डवो ने महाभारत के युद्ध में कौरवो की सेना को पराजित कर विजय हासिल की।
     करवा चौथ के व्रत में चन्द्रमा निकलने तक कुछ भी अन्न-जल ग्रहण नहीं किया जाता है, इसलिये व्रत रखने से पूर्व महिलाओं को एक दिन पहले रात्रि में अपनी रुचि के अनुसार भोजन, मिष्ठान, फल आदि का सेवन अवश्य कर लेना चाहिये। जिन महिलाओं को ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, खून की कमी आदि बीमारी हो अथवा वे गर्भवती हो तो उन्हे अपने डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही व्रत रखना चाहिये। व्रत खोलते समय खाली पेट सिर्फ पानी नहीं पीना चाहिये बल्कि पहले कुछ मीठा या फल खाने के बाद ही पानी लेना चाहिये। ताजा फलो का रस भी लिया जा सकता है। खाली पेट पानी पीने से ऐसीडिटी अथवा पेट दर्द की समस्या हो सकती है। व्रत के बाद भोजन एक साथ न करके थोडे-थोडे अंतराल पर ही करना चाहिये। भोजन में अधिक तले-भुने और गरिष्ट खाद्य पदार्थो के सेवन से बचना चाहिये। व्रत शरीर और मन की शुद्धता के लिये किये जाते हैं,  इसलिये यह आवश्यक है कि महिलाये समझदारी से व्रत रखे और अपने संपूर्ण परिवार की खुशहाली का माध्यम बने। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल

Thursday, October 17, 2013

18 अक्तूबर , 2013 : शरद पूर्णिमा पर विशेष

धन-धान्य और सुख प्रदाता है शरद पूर्णिमा व्रत 
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी तिथि को शरद पूर्णिमा या कार्तिक पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने मुरली वादन करते हुये पतित पावनी यमुना जी के तट पर गोपियो के साथ रास रचाया था इसलिये इसे "रास पूर्णिमा" भी कहा जाता है. नारद पुराण में इस तिथि को "कोजागर व्रत" कहा गया है।  पुराण और शास्त्रों के अनुसार इस दिन विधि-विधान से व्रत करके धन की देवी महालक्ष्मी, श्री कृष्ण और चन्द्र देवता की आराधना करने से धन-धान्य, सुख-शान्ति एवं सद्गति की प्राप्ति होती है।
     नारद पुराण में कहा गया है कि शरद पूर्णिमा के दिन प्रातः स्नान करके उपवास रखते हुए जितेंद्रिय भाव से रहना चाहिये। ताम्बे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र और आभूषण से सुसज्जित लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करके उनकी धूप,  दीप,पुष्प, नैवेद्य, अन्न, फल, शाक आदि से पूजन करते हुए घी, शक्कर, चावल तथा दूध से निर्मित खीर का प्रसाद लगाकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखना चाहिए। इस दिन रात्रि के समय दीप दान करना भी शुभ माना गया है।  ऐसा करने से मनुष्य इस लोक में सुख भोग कर अन्त मे विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
    कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात में धन एवं समृद्धि की देवी महालक्ष्मी अपना रुप परिवर्तित करके भू लोक पर विचरण करते हुए यह देखती है कि कौन-कौन मनुष्य जागरण कर रहा है।  देवी भागवत के अनुसार जो मनुष्य इस रात्रि में पूर्ण श्रद्धा भाव, नियम-धर्म और पवित्र आचरण के साथ  भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी की  पूजा-अर्चना करते हुए जागरण करता  है, उस पर लक्ष्मी जी की असीम कृपा होती है और उसके जीवन में सुख-समृद्धि, धन तथा शान्ति का कभी अभाव नही रह्ता है।
    शरद पूर्णिमा के दिन सन्तान सुख की कामना के साथ व्रत रखे जाने का भी विधान है।  इस सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है।  एक साहूकार की दो पुत्रियों में से एक पुत्री तो पूर्णमासी का व्रत विधि-विधान के साथ पूरा करती, जबकी दूसरी पुत्री आधे-अधूरे मन से व्रत रखती। इस कारण उसकी संतानें जीवित नहीं रह पाती थी।  एक बार जब उस पुत्री के नवजात पुत्र की मृत्यु हो गई तो उसने एक ब्राह्मण के कहे अनुसार अपने मृत पुत्र को पीढ़े पर लिटाकर कपडे से ढक दिया।  इसके बाद उसने अपनी बहन को बुलाया और उस पीढे पर बैठने को कहा।  जैसे ही उस बहन का वस्त्र मृत बच्चे के शरीर से छुआ, वह जीवित होकर रोने  लगा।  यह देखकर बहन क्रोधित हो गई और बोली, अगर पीढ़े पर बैठने से लड़का मर जाता तो क्या उसे कलंक नहीं लगता। बहन की बात सुनकर उसने कहा कि उसका पुत्र तो पहले से ही मृत था, वह तो तुम्हारे स्पर्श से जीवित हुआ है क्योंकि तुम जो श्रद्धा भाव से पूर्णमासी का व्रत करती हो वह उसी का पुण्य प्रभाव है।  इसके बाद उसने यह मुनादी  करवा दी कि जो भी स्त्री-पुरुष शरद पूर्णिमा का व्रत करेंगें, उनकी समस्त मनोकामनायें पूरी होंगी और उन्हे सन्तान का सुख भी प्राप्त होगा।
    शरद पूर्णिमा वाले दिन सायं काल में घर के मन्दिर में, तुलसीजी के पास, पीपल के वृक्ष के नीचे शुद्ध घी के दीपक प्रज्ज्वलित करने चाहिए। रात्रि में पूर्ण विधि-विधान से महालक्ष्मी का अनुष्ठान करते हुए पुरुष सूक्त, श्री सूक्त, लक्ष्मीस्तव, कनकधारा स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। पाठ पूर्ण होने के बाद कमलगट्टा, सुपारी, पंचमेवा, नारियल, बेलफल, मखाने, हवन सामग्री आदि से मन्त्र "ॐ ह्रीं श्री दारिद्र्यनाशिन्यै नारायण प्रियवल्लभायै भगवत्यै महालक्ष्मये स्वाहा" का  जप करते हुए एक सौ आठ आहुतियों के साथ हवन करना चाहिए। यदि स्वयं पाठ करना सम्भव न हो तो किसी वैदिक ब्राह्मण से पाठ करवा कर एवं अपनी श्रद्धा के अनुसार भोजन कराकर अन्न, वस्त्र, फल, धन आदि दान देना चाहिए। इस प्रकार किए गए अनुष्ठान से अनन्त फल की प्राप्ति होती है।
    ज्योतिष मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्र देवता शोडश कलाओं से परिपूर्ण होते है. इस रात्रि  चन्द्रमा का प्रकाश अन्य दिनों की अपेक्षा बहुत अधिक होता है।  इसलिए शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा को जल या दुग्ध मिश्रित जल से अर्घ्य देना, चन्द्रमा की रोशनी में खीर रखना, सुई में धागा पिरोना, रात्रि में चन्द्र दर्शन करना जैसे कार्य करना शुभ फल देने वाले माने गए है।  विवाह होने के बाद जो स्त्री-पुरुष पूर्णमासी का व्रत रखना चाह्ते है, उन्हें शरद पूर्णिमा से ही व्रत की शुरुआत करनी चाहिए।
    जन्म कुण्डली में ग्रह दोष होने पर शरद पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा का पूजन करके "ॐ श्रां श्री श्रौ सः सोमाय नमः" मन्त्र का जप करने से ग्रह शान्ति होने के साथ-साथ महालक्ष्मी और चन्द्र देवता की कृपा से विभिन्न समस्यायों का समाधान होता है तथा जीवन में समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल


Saturday, October 12, 2013

विजय का पर्व विजयदशमी

      विजय दशमी को समस्त कामनाओं की पूर्ति और विजय का पर्व माना जाता है धार्मिक ग्रन्थों  में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय दशमी पर्व मनाये जाने का विधान है। इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने अधर्म, अन्याय और अत्याचार के प्रतीक लंका के राजा रावण का वध किया था धार्मिक ग्रन्थों  अनुसार जब भी पृथ्वी पर धर्म की हानि होने से अन्याय, अत्याचार और अनाचार बढने लगते हैं, भगवान मनुष्य  शरीर धारण करके इस पृथ्वी पर अवतरित होते हैं 
भगवान विष्णु के अवतार के रुप में प्रभु श्री राम ने भी ऋषि-मुनियों तथा राज्य की जनता को राक्षसो से निजात दिलाने के लिए चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को कर्क लग्न और पुनर्वसु नक्षत्र में कौशल नरेश दशरथ के यहाँ महारानी कौशल्या की कोख से जन्म लिया। भगवान श्री राम महानता की अद्भुत प्रतिमूर्ति थे उनकी लीलायें मनुष्यों के लिए आदर्श का पर्याय हैं गुरुकुल में निस्वार्थ भाव से गुरु सेवा, वचन पालन के लिए वन गमन, शरणागत की रक्षा, मित्र धर्म का निर्वहन, एक पत्नीव्रत पालन, भाई के प्रति प्रेम, शान्त-चित्त व्यक्तित्व, उदारता, दया भाव, समस्त चर-अचर जीवों के प्रति प्रेम एवं स्नेह- भगवान श्री राम के व्यक्तित्व और कृतित्व की महानता को दर्शाते हैं 
    चूकि विजय दशमी को समस्त मांगलिक कार्यो के लिये प्रशस्त माना जाता है, इसलिये ज्योतिष शास्त्र में इन इस तिथि को अबूझ मानते हुए इस दिन विभिन्न संस्कार युक्त कार्य जैसे बच्चे का नामकरण, अन्न प्राशन, मुंडन, कर्ण छेदन, यज्ञोपवीत, वेदारंभ, ग्रह प्रवेश, भूमि पूजन, नवीन व्यापार या दुकान का  उद्घाटन, नए वाहन या सामान की खरीद आदि कार्य किए जाने की अनुमति दी गयी है
    नवरात्र के नौ दिनों तक मा दुर्गाजी के नौ स्वरूपों की आराधना करके दशमी तिथि को विजय दशमी पर समस्त सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए अत्यन्त पवित्र माने जाने वाले शमी वृक्ष और अस्त्र-शस्त्र की पूजा की जाती है पौराणिक कथा के अनुसार हनुमान जी ने जनक नन्दनी सीता जी को शमी के समान पवित्र कहा था, इसलिए माना जाता है कि इस दिन घर की पूर्व दिशा में या मुख्य स्थान में शमी की टहनी प्रतिष्ठित करके उसके पूजन से घर-परिवार में खुशहाली आती है और विवाहित महिलाओ का सौभाग्य अखण्ड बना रहता है
शमी के पूजन से मनुष्य के पाप और मुसीबतों का अन्त भी होता है 
रावण काम, क्रोध, मद्, लोभ और मोह जैसी बुराइयो का प्रतीक हैअयोध्या पति श्री राम ने रावण का वध करके संसार को यह संदेश दिया कि ये सभी बुराईया मनुष्य के पतन का कारण हैं ज्ञानी-ध्यानी और विद्वान होने के बावजूद अगर किसी मनुष्य में ये समस्त बुराइया विद्यमान हैं तो उसकी सारी योग्यतायें व्यर्थ हैं मनुष्य के बुरे कर्म एक न एक दिन उसके अन्त का कारण अवश्य ही  बनते हैं 
 विजय दशमी के दिन सकल सिद्धियों की प्रदाता अपराजिता देवी जी की पूजा-अर्चना भी की जाती है शास्त्रों के अनुसार अपराजिता देवी को मा दुर्गा भगवती का अवतार माना गया है इनके पूजन  से कार्यों में विजय हासिल होती है और जीवन में आने वाली परेशानियों एवं समस्यायों का अन्त होता है इसके अलावा जीवन में सभी कामों में सफलता पाने के लिए इस दिन रामरक्षास्त्रोत, श्री रामचरित मानस का सुन्दरकाण्ड और लंका काण्ड में वर्णित राम-रावण युद्ध का पाठ करना भी शुभ माना गया है  
    वर्तमान समय में श्री राम का सम्पूर्ण जीवन दर्शन न सिर्फ प्रासंगिक और अनुकरणीय है बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे दुर्गुणों को दूर करने के लिए भी अनिवार्य है जिस प्रकार विजय दशमी पर्व  अधर्म पर धर्म की विजय का पर्व है उसी प्रकार भगवान श्री राम का आदर्श व्यक्तित्व महान और प्रभावशाली है जीवन में सुख, समृद्धि, कामनाओ की पूर्ति तथा विजय प्राप्त करने के लिए विजय दशमी पर्व पर श्री राम की आराधना करते हुए उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प लेना चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल