Friday, September 20, 2013

पितृ ऋण से मुक्ति देता है श्राद्ध कर्म

वैदिक कर्मकांड के अंतर्गत होने वाले पांच महायज्ञों में श्राद्ध कार्य को विशेष महत्त्व दिया है. श्राद्ध में पिंड दान, तर्पण और ब्राहमण भोजन शामिल हैं. ऐसा माना जाता है कि ऋण से मुक्त होने के लिए पुत्र को श्राद्ध कर्म का पालन आवश्यक रूप से करना चाहिए। पुराणों के  अनुसार माता-पिता अथवा अन्य पूर्वजों की निर्वाण तिथि पर गया में पिंड दान करने, ब्राह्मण को भोजन कराने और तर्पण करने से पुत्र को पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है.
   पितृ पक्ष में सूर्य देवता कन्या राशि के दशम अंश पर आते हैं और वहां से तुला राशि की ओर गमन करते हैं. सूर्य देव की इस गति को कन्यागत सूर्य कहा जाता है. इस स्थिति में अपने पितरों का श्राद्ध करना आवश्यक माना गया है. प्रति वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तिथि तक श्राद्ध पक्ष होता है. इस वर्ष 20 सितम्बर से पितृ पक्ष आरम्भ हो रहे हैं. 
श्राद्ध पक्ष में अपने दिवंगत पूर्वजों की शांति और तृप्ति के निमित्त पकाए हुए शुद्ध पकवान, दूध, दही, घी, मिष्ठान आदि का दान करने का विधान है. 
     ब्रह्म पुराण के अनुसार श्रद्धा पूर्वक किये गए श्राद्ध से पित्रगण  प्रसन्न होकर मनुष्य को धन, संतान, विद्या, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष एवं स्वर्ग प्रदान करते हैं. याग्वल्क्य के मतानुसार श्राद्ध करने के पुण्य प्रभाव से दीर्घायु, आज्ञाकारी पुत्र, धन, विद्या, दुर्लभ मोक्ष, संसार के समस्त सुख आदि प्राप्त होते हैं. 
   वर्ष की जिस तिथि को पूर्वज दिवंगत हुए हैं, उसी तिथि वाले दिन श्राद्ध करना चाहिए। इसके लिए श्राद्ध वाले दिन मनुष्य को प्रातः नित्य कर्मों से निवृत्त होने के उपरांत सुयोग्य ब्राह्मण को अपने यहाँ भोजन के लिए श्रद्धा पूर्वक आमंत्रित करना चाहिए। विष्णु पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध और तर्पण से पितृगण तृप्त और प्रसन्न होकर समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं. इसलिए श्राद्ध वाले दिन ब्राह्मण को शुद्ध भोजन, वस्त्र, अन्न, दक्षिणा आदि देकर प्रसन्न करना चाहिए। इसके अलावा पकाए गए भोजन में से ,गौ माता, श्वान, काक, चींटी और देवताओं के नाम से भी ग्रास निकालना चाहिए। श्राद्ध कर्म की इस प्रक्रिया में भोजन के कुछ अंश को अग्नि देव को समर्पित करके भी जल से तर्पण किया जाता है. 
श्राद्ध कर्म के लिए इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि श्राद्ध सदैव अपने घर पर ही किया जाये। किसी दुसरे के घर पर किया गया श्राद्ध निषिद्ध होता है. श्राद्ध करते समय किसी तरह का दिखावा नहीं करना चाहिए तथा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार ही श्राद्ध में दान आदि करना उचित रहता है. धन के अभाव में घर में निर्मित खाद्य पदार्थ को अग्नि को समर्पित करके जल से तर्पण करते हुए गौ माता को खिला कर भी श्राद्ध कर्म पूर्ण किया जा सकता है. 
   श्राद्ध कर्म में कभी भी बासी अथवा अखाद्य पदार्थ नहीं परोसने चाहिए।धार्मिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के भोजन में बेंगन, गाजर, मसूर की दाल, अरहर की दाल, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, गोल लौकी,  जामुन,महुआ, चना, अलसी, काला  जीरा,पीली सरसों, आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए अन्यथा श्राद्ध प्रभावहीन हो जाता है. 
  श्राद्ध पक्ष में किसी भी तरह के शुभ और मंगल कार्य को करना निषिद्ध माना गया है. इसके अलावा इन दिनों बाल कटवाना, घर में दही बिलोना, देव प्रतिमा की प्रतिष्ठा करना, नए वस्त्र  खरीदना,मकान में पेंट या पुताई करवाना, संतान का विवाह करना अथवा विवाह की बात चलाना, नए मकान का मुहूर्त करना, कुआ खुदवाना, किसी नए कार्य या व्यापार की शुरुआत करना भी अशुभ माना गया है.  
   श्राद्ध के सम्बन्ध में यह जानना भी आवश्यक है कि जन्म देने वाले पूर्वजों जैसे  दादा-दादी और माता-पिता की मृत्यु के प्रथम वर्ष में श्राद्ध नहीं करना चाहिए। श्राद्ध करने का सही समय अपराह्न काल है. पूर्वाह्न में, सायं काल में, रात्रि के समय, चतुर्दशी तिथि को और परिवार के किसी सदस्य या स्वयं के जन्म दिन को श्राद्ध नहीं करना चाहिए। कूर्म पुराण में कहा गया है कि अग्नि या विष आदि द्वारा आत्महत्या करके मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति का श्राद्ध नहीं करना चाहिए। जिन पितृगण की मृत्यु चतुर्दशी तिथि को हुई हो, उनका श्राद्ध अमावस्या की तिथि वाले दिन करना चाहिए। युद्ध के दौरान शस्त्र से मृत्यु को प्राप्त पितरों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जा सकता है. 
   श्राद्ध पक्ष वास्तव में पितरों को याद करके उनके प्रति श्रद्धा भाव प्रदर्शित करने और नयी पीढी को अपनी प्राचीन वैदिक और पौराणिक संस्कृति से अवगत करवाने का पर्व है. इस पक्ष में ब्राह्मण को भोजन करने, दान-दक्षिणा आदि देने से हमारे पापों का अंत होता है, ग्रहों के दुष्प्रभाव दूर होते हैं और पितरों का आशीर्वाद एवं कृपा प्राप्त होने से समस्त सुख-सुविधाएं मिलने लगती हैं. पितरों का श्राद्ध करने से जन्म कुंडली में पितृ दोष से भी छुटकारा मिलता है.-- प्रमोद कुमार अग्रवाल

श्राद्ध कर्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है गया

मृत पूर्वजों का आशीर्वाद और भगवान् विष्णु की कृपा प्राप्ति के लिए श्राद्ध कर्म करने का विधान पुराणों में मिलता है. भविष्य पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध बारह तरह के होते हैं, जिनके नाम हैं- नित्य श्राद्ध, नैमित्यिक श्राद्ध, काम्य श्राद्ध, वृद्धि श्राद्ध, सपिण्डन श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, गोष्ठ श्राद्ध, शुद्धि श्राद्ध, कर्मांग श्राद्ध, दैविक श्राद्ध, औपचारिक श्राद्ध और साम्वत्सरिक श्राद्ध। इन समस्त श्राद्धों में साम्वत्सरिक श्राद्ध को सबसे श्रेष्ठ माना गया है. साम्वत्सरिक श्राद्ध मृत पूर्वज की मृत्यु की तिथि वाले दिन किया जाता है. 
   पुराणों की अनुसार पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने के लिए गया से श्रेष्ठ स्थान कोई दूसरा नहीं है. कहा जाता है कि गया में स्वयं भगवान् विष्णु पितृ देवता के रूप में निवास करते हैं. गया तीर्थ में श्राद्ध कर्म पूर्ण करने के बाद भगवान विष्णु के दर्शन करने से मनुष्य पितृ ऋण, माता के ऋण और गुरु के ऋण से मुक्त हो जाता है. पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान के साथ श्राद्ध और तर्पण करने से पितृ, देवता, गन्धर्व, यक्ष आदि अपना शुभ आशीर्वाद देते हैं जिससे मनुष्य के समस्त पापों का अंत हो जाता है. 
   गया तीर्थ में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किये जाने के बारे में एक प्राचीन कथा का उल्लेख पुराणों में मिलता है. कथा के अनुसार, गयासुर नाम के एक अत्यंत पराक्रमी असुर ने घोर तपस्या करके भगवान् से आशीर्वाद प्राप्त कर लिया। भगवान् से मिले आशीर्वाद का सदुपयोग न करके गयासुर ने देवताओं को ही परेशान करना शुरू कर दिया। गयासुर के अत्याचार से संतप्त देवताओं ने भगवान् विष्णु की शरण ली और उनसे प्रार्थना की कि  वे गयासुर से देवताओं की रक्षाकरें।  इस पर भगवान् विष्णु ने अपनी गदा से गयासुर का वध कर दिया। बाद में भगवान् विष्णु ने गयासुर के सर पर एक पत्थर रख कर उसे मोक्ष प्रदान किया। कहते हैं कि गया स्थित विष्णुपद मंदिर में वह पत्थर आज भी मौजूद है. भगवान् विष्णु द्वारा गदा से गयासुर का वध किये जाने से उन्हें गया तीर्थ में मुक्तिदाता माना गया. 
   कहा जाता है कि गया में यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण और पिंड दान करने से मनुष्य को स्वर्गलोक एवं ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है. गया के धर्म पृष्ठ, ब्रह्म सप्त, गया शीर्ष और अक्षय वट के समीप जो कुछ भी पितरों को अर्पण किया जाता है , वह अक्षय होता है. गया के प्रेत शिला में पिंड दान करने से पितरों का उद्धार होता है. पिंड दान करने  के लिए काले तिल, जौ का आटा , खीर, चावल, दूध, सत्तू आदि का प्रयोग किये जाने का  विधान है. 
    अगर किसी मनुष्य की मृत्यु संस्कार रहित दशा में अथवा किसी पशु, चोर, सर्प या जंतु के काटने से हो जाती है तो गया तीर्थ में उस मृत व्यक्ति का श्राद्ध कर्म करने से वह बंधनमुक्त होकर स्वर्ग को गमन करता है, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए। गया में श्राद्ध कर्म करने के लिए दिन और रात का कोई विचार नहीं है. दिन अथवा रात में किसी भी समय श्राद्ध कर्म और तर्पण किया जा सकता है.   
     नारद पुराण में पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने का तरीका बताया गया है. जिसके अनुसार विधि-विधान से मन्त्र उच्चारण करते हुए योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराने, अपनी श्रद्धानुसार दान देने और उन्हें प्रसन्न करने से पितरों के आशीर्वाद से  धन,संपत्ति, सुख, आरोग्य मिलने लगते हैं तथा संतान परम्परा का नाश नहीं होता है. 
    पापों की मुक्ति के लिए भी श्राद्ध कर्म करना श्रेष्ठ माना गया है. कहते हैं कि जो मनुष्य अपने पूर्वजों का श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध नहीं करता है, उसके द्वारा की गयी पूजा को भगवान् भी स्वीकार नहीं करते हैं. माता-पिता का श्राद्ध न करने वाली संतान घोर नरक में जाती है, ऐसा पुराणों में वर्णित है. वेद ग्रंथों के विक्रय और स्त्री से प्राप्त धनराशि से श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। 
     पितृ पक्ष श्राद्ध कर्म के लिए श्रेष्ठ माने गए हैं. परन्तु जिस मनुष्य को अपने माता-पिता की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो तो वह अमावस्या के दिन विधि पूर्वक श्राद्ध कर सकता है. गौ माता, पितर, और ब्राह्मण की भक्ति पूर्वक पूजा करने से श्राद्ध कर्म पूर्ण हुआ माना जाता है.
   श्राद्ध करने के अधिकारी केवल पुत्र ही नहीं है, बल्कि मृतक की पुत्री अथवा अन्य महिला सदस्य भी पितरों का श्राद्ध कर सकती हैं. स्मृति संग्रह और श्राद्ध कल्पलता में दी गयी व्यवस्था के अनुसार पुत्र, पुत्र, पुत्री का पुत्र, पत्नी, भाई-भतीजा, पुत्र-वधु, बहन, भांजा, पूर्व की सात पीढी तक के परिवार का सदस्य और आठवी पीढी से चौदहवी पीढ़ी तक का परिवार का सदस्य श्राद्ध कर्म कर सकता है. यदि इस क्रम में कोई न मिले तो, माता पक्ष के सपिंड (पूर्व की सात पीढी तक के परिवार का सदस्य )और सोदक ( आठवी पीढी से चौदहवी पीढ़ी तक का परिवार का सदस्य ) को श्राद्ध करने का अधिकार दिया गया है. धर्म शास्त्रों के अनुसार विवाहित पुत्री, पत्नी, कुल पुरोहित, मित्र आदि भी श्राद्ध करने के अधिकारी माने गए हैं. 
    धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि मृतक का श्राद्ध समय पर ही करना चाहिए। क्योकि सपिण्डी श्राद्ध द्वारा मृतक को पितरों की श्रेणी में प्रवेश मिलता है. श्राद्ध करने में देरी करने से मृतक की आत्मा को कष्ट मिलता है, जिसके प्रभाव से मृतक की संतान भी अनेक प्रकार के कष्ट भोगती हैं. प्रत्येक माह में आने वाली अमावस्या की तिथि को भी दक्षिण की मुख करके जल द्वारा तर्पण किया जा सकता है. 
     गरुण पुराण में गया को मुक्ति का साधन बताते हुए कहा गया है कि मनुष्य की मुक्ति के चार मार्ग हैं- ब्रह्म ज्ञान, गया में श्राद्ध, कुरुक्षेत्र में निवास तथा गौशाला में मृत्यु। जो मनुष्य अपने घर से गया के लिए प्रस्थान करते हैं, गया पहुँचने तक उनका प्रत्येक कदम पितरों के स्वर्गारोहण के लिए सीढ़ी बनता जाता है. पितृ पक्ष में पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए गया जाकर हम अपने लिए पितृ ऋण से मुक्त होने का मार्ग चुन  सकते हैं.-- प्रमोद कुमार अग्रवाल
     

Wednesday, September 18, 2013

18 सितम्बर,2013: अनन्त चतुर्दशी व्रत पर्व पर विशेष

अनन्त चतुर्दशी व्रत से मिलती हैं समस्त सिद्धियाँ


     भाद्रपद मास की चतुर्दशी तिथि को अनन्त चतुर्दशी का व्रत किया जाता है. इस दिन अनन्त भगवान् की पूजा अर्चना की जाती है तथा रेशम के धागे में चौदह गांठ लगाकर अनन्त बनाते हैं और अपनी भुजा में बांधते हैं. पुरुषों के लिए दाहिनी भुजा में और स्त्रियों के लिए बायीं भुजा में बनाया गया अनन्त बाँधने का विधान है.अनन्त भगवान् का श्रृंगार करके पूजा उपासना के बाद उनके भी अनन्त धारण किया जाता है. 
     भविष्य पुराण में कहा गया है कि अनन्त नाम  भगवान् श्री  कृष्ण का ही है. पुराण में दिए गए एक प्रसंग में भगवान  कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि संसार का भार उतारने और दानवों का संहार करने के लिए ही वे वासुदेव जी के कुल में अवतरित हुए हैं तथा वे ही विष्णु, शिव, ब्रह्मा, भास्कर, शेष, सर्व व्यापी ईश्वर तथा अनन्त हैं.
     अनन्त चतुर्दशी के दिन स्त्री एवं पुरुष प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, मीठी पूरी अथवा हलवा आदि से अनन्त स्वरुप भगवान् विष्णु की उपासना करते हैं. भगवान् अनन्त के समक्ष चौदह गाँठ लगाकर बनाया गया अनंत " अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान सम्भ्युद्दर वासुदेव। अनन्तरूपे विनियोजितात्मा ह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते।।" मन्त्र का उच्चारण  करते हुए अपनी भुजा में धारण करते हैं. अनन्त चतुर्दशी पर बांधे गए अनन्त को गाज  कहा जाता है. इस प्रकार धारण कियॆ गए गाज अर्थात अनन्त को भाद्रपद मास के किसी भी शुभ दिन को खोला जाता है।  गाज खोलने के बाद इस गाज को मीठी पूरी पर रखते हैं और गेहूं  के दानों  के साथ गाज माता की कथा सुनते हैं. 
     गाज माता की कहानी के अनुसार, एक निःसंतान रानी को अनन्त और गाज माता की कृपा से संतान उत्पन्न हुई. रानी ने किये गए संकल्प जब पूरे नहीं किए तो गाज माता के क्रोध ने उस संतान को रानी के घर से एक भील के यहाँ पहुंचा दिया। रानी को जब अपनी भूल का अहसास हुआ तो उसने गाज माता से क्षमा याचना की और पूर्ण विधि-विधान से गाज माता की कथा सुनी। इससे गाज माता की अनुकम्पा से रानी को उसकी संतान वापस प्राप्त हो गयी. 
     अनन्त चतुर्दशी का व्रत-अनुष्ठान करने वाले स्त्री-पुरुषों के समस्त पाप दूर हो जाते हैं,मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और समस्त रिद्धियाँ प्राप्त होती हैं. भगवान् कृष्ण ने स्वयं कहा है कि जो मनुष्य अनन्त - व्रत करता है, उसे उत्तम नक्षत्र, पुत्र एवं पौत्र सुख की प्राप्ति होती हैं तथा वह इस  लोक में समस्त सुख भोगकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त हो जाता है. -- प्रमोद कुमार अग्रवाल (ज्योतिष एवं वास्तु सलाहकार)

Tuesday, September 10, 2013

ज्योतिष के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए प्रमोद अग्रवाल को मिला सम्मान - पत्र और अंतर्राष्ट्रीय सदस्यता

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ज्योतिष और वेद -शास्त्रों के
 प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित इण्टरनेशनल 
ज्योतिष एवं वेद विज्ञान रिसर्च फाउण्डेशन,
 के अध्यक्ष प्रख्यात ज्योतिषाचार्य पण्डित 
वेद प्रकाश जाबली और महासचिव 
डॉक्टर रवि रस्तोगी
 ने ज्योतिष एवं धर्म-अध्यात्म
 के क्षेत्र में लेखन और 
जागरूकता कार्य के लिए कमला नगर, आगरा निवासी ज्योतिषविद
 प्रमोद कुमार अग्रवाल
 को श्रेष्ठ कार्यकर्त्ता के रूप में
 सम्मानित करते हुए
 फाउण्डेशन में 
विशिष्ट सहयोगी सदस्य के पद पर
 मनोनीत किया है. 
विधि एवं लेखन के क्षेत्र से जुड़े तथा
 "ज्योतिष विद्या विशारद" प्रशिक्षित
 प्रमोद अग्रवाल को वर्ष 2012 में
 इंडियन एस्ट्रोलोजिकल रिसर्च इंस्टीटय़ूट,जसीडिह झारखण्ड द्वारा "ज्योतिष दिग्विजयी" तथा 
मई, 2013 में भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थानम,
वाराणसी उत्तर प्रदेश द्वारा "ज्योतिष कौमुदी" 
के राष्ट्रीय सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। 
उल्लेखनीय है कि प्रमोद अग्रवाल के देश के
 विभिन्न समाचार पत्र और पत्रिकाओं में
 फलित ज्योतिष, वास्तु शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र
 के साथ- साथ धार्मिक और अध्यात्मिक
 विषयों पर नियमित लेख प्रकाशित हो रहे हैं. 

Saturday, September 7, 2013

08 सितम्बर (रविवार) : हरतालिका व्रत पर्व पर विशेष

हरतालिका व्रत से मिलता है सौभाग्य
 भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीय तिथि को हरतालिका व्रत किया जाता है. इसे भविष्य पुराण में हरकाली व्रत के नाम से बताया गया है. सौभाग्य की आकांक्षा रखने वाली स्त्रियों को यह व्रत करना करना चाहिए, परन्तु इस व्रत को पुरुष भी कर सकते हैं क्योंकि इस व्रत के करने के लिए स्त्री पुरुषों में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं किया गया है और इस व्रत के प्रभाव से स्त्री और पुरुषों को समान रूप से मिलने वाले शुभ फल का प्रावधान भविष्य पुराण में है. इस व्रत में आरोग्य, दीर्घायु, सौभाग्य, संतान, धन-सम्पदा, शारीरिक एवं बल तथा ऐश्वर्य आदि प्रदान करने वाली माता भगवती हरकाली देवी जी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है.
  हरतालिका व्रत किये जाने के सम्बन्ध में एक प्राचीन कथा है. जिसके अनुसार, महाराजा दक्ष प्रजापति की काली नाम की कन्या का विवाह भगवान् शंकर के साथ हुआ था. काली का वर्ण नीलकमल के सामान काला था. एक बार जब भगवान् शंकर भगवान् विष्णु जी के साथ विराजमान थे, तभी भगवान् शंकर ने काली को "प्रिये गौरी " का उच्चारण करते हुए पुकारा। यह सुनकर काली ने इसे अपना अपमान समझा और हरित वर्ण की कांति हरी दूर्वा घास में अग्नि प्रज्वलित  करते हुए उस अग्नि में अपनी देह को भस्म कर लिया।
 तत्पश्चात काली ने दुबारा हिमालय राज के यहाँ गौरवर्ण पुत्री के रूप में जन्म लिया। नए जन्म में उनका नाम गौरी रखा गया. इस जन्म में भी उन्होंने भगवान् शिव को अपने वर के रूप में चुनते हुए विवाह रचाया। इसलिए भगवान् शिव की आराध्या शक्ति माता भगवती का नाम हरकाली कहलाया।
 भविष्य पुराण में वर्णित है कि हरकाली अर्थात हरतालिका व्रत रखने वाली स्त्रियों को इस दिन नए धान्य एकत्र करके अंकुरित हरी घास से भगवती हरकाली की प्रतिमा बनानी चाहिए और पुष्प, धूप, दीप, मोदक, फल आदि के साथ उनकी उपासना करनी चाहिए। उपासना करते समय "हरकर्मसमुत्पन्ने हरकाये हरप्रिये। माँ त्राहीशस्य मूर्तिस्थते प्रणतोअस्मि नमो नमः. मन्त्र का जप अवश्य करना चाहिए। रात्रि काल में सौभाग्यवती स्त्रियों को माँ हरकाली देवी की कृपा प्राप्त  करने के लिए रात्रि जागरण करते हुए भक्तिमय गीत, संगीत और नृत्य करना चाहिए।
दूसरे दिन प्रातःकाल में अर्थात चतुर्थी के दिन माँ हरकाली की प्रतिमा को किसी पवित्र नदी अथवा जलाशय में "अर्चितासी मया भक्त्या गच्छ देवी सुरालयम। हरकाले शिवे गौरि पुनरागमनाय च." मन्त्र  का जप करते हुए विसर्जित कर देना चाहिए।
 इस प्रकार पूर्ण श्रद्धा भाव और विधि-विधान से हरतालिका व्रत करने से माँ हरकाली और भगवान् शिव की असीम कृपा से स्त्रियों को पति सुख के साथ-साथ अन्य समस्त सुख भी प्राप्त होते हैं. जो पुरुष इस व्रत को प्रत्येक वर्ष करते हैं उन्हें भी दीर्घायु, आरोग्य, संतान और धन आदि सुखों की सहज ही प्राप्ति होती है.-- प्रमोद कुमार अग्रवाल