Thursday, August 29, 2013

चन्द्र स्वर में कार्य करें तो मिलेगी सफलता

समस्त प्राणियों में जीवित रहने के लिए श्वास प्रक्रिया आवश्यक होती है। इसमें जीवनदायिनी ऑक्सीजन गैस ग्रहण करके दूषित कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन किया जाता है। मनुष्यों में श्वास प्रक्रिया के लिए नाक में बने हुए दो नासा छिद्र सहयोग करते हैं। एक नासा छिद्र से श्वास का आगमन होता है तो दूसरे छिद्र से श्वास का उत्सर्जन होता है। यह क्रम स्वतः ही परिवर्तित होता रहता है।
ज्योतिष शास्त्र में स्वरोदय विज्ञान इस बात को स्पष्ट करता है कि यदि नासा छिद्रों की श्वास प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए कोई कार्य किया जाये तो उसमें अपेक्षित सफलता अवश्य प्राप्त होती है। 
नासिका के दाहिने छिद्र अथवा बाएं छिद्र से श्वास आगमन को "स्वर चलना" कहा जाता है। नासिका के दाहिने छिद्र से चलने वाले स्वर को "सूर्य स्वर" और बाएं छिद्र से चलने वाले स्वर को "चन्द्र स्वर" कहते हैं। सूर्य स्वर को भगवान शिव का जबकि चन्द्र स्वर को शक्ति की आराध्य देवी माँ का प्रतीक माना जाता है। 
स्वर शास्त्र के अनुसार वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियां चन्द्र स्वर से तथा मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु एवं कुम्भ राशियाँ सूर्य स्वर से मान्य होती हैं। चन्द्र स्वर में श्वास चलने को "इडा" और सूर्य स्वर में श्वास चलने को "पिंगला" कहा जाता है।  दोनों छिद्रों से चलने वाली श्वास प्रक्रिया "सुषुम्ना स्वर" कहलाती है। 
स्वरोदय विज्ञान की मान्यता के अनुसार पूर्व और उत्तर दिशा में चन्द्र तथा पश्चिम और दक्षिण दिशा में सूर्य रहता है। इस कारण जब नासिका से सूर्य स्वर चले तो  पश्चिम और दक्षिण दिशा में तथा जब नासिका से चन्द्र स्वर चले तो  पूर्व और उत्तर दिशा में जाना अशुभ फल देने वाला होता है। चन्द्र स्वर चलने पर बायां पैर और सूर्य स्वर चलने पर दाहिना पैर आगे बढाकर यात्रा करना शुभ होता है।
चन्द्र स्वर चलते समय किये गए समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए यदि स्त्री के साथ प्रसंग के आरम्भ में पुरुष का सूर्य स्वर चले तथा समापन पर चन्द्र स्वर चले तो शुभ होता है।
सूर्य स्वर चलने के दौरान अध्ययन एवं अध्यापन करना, शास्त्रों का पठन-पाठन, पशुओं की खरीद-फरोख्त,औषधि सेवन, शारीरिक श्रम, तंत्र-मन्त्र साधना, वाहन का शुभारम्भ करना जैसे कार्य किये जा सकते हैं। जबकि चन्द्र स्वर चलते समय गृह प्रवेश, शिक्षा का शुभारम्भ, धार्मिक अनुष्ठान, नए वस्त्र और आभूषण धारण करना, भू-संपत्ति का क्रय-विक्रय, नए व्यापार का शुभारम्भ, नवीन मित्र सम्बन्ध बनाना, कृषि कार्य और पारस्परिक विवादों का निस्तारण करना जैसे कार्य शुभ फल देने वाले होते हैं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल 

Friday, August 23, 2013

भाग्य और पुरुषार्थ

मनुष्य के जीवन के साथ भाग्य और पुरुषार्थ दोनों ही जुड़े हैं. पुरुषार्थ अर्थात कर्मके बिना फल की प्राप्ति कदापि संभव नहीं है. पुरुषार्थ न करने वाले मनुष्य के पास लक्ष्मी का सदैव अभाव बना रहता है. कर्म करते रहने से ही समस्त कार्य पूर्ण होते हैं. लेकिन इसके बावजूद जीवन में भाग्य की प्रवलता भी बहुत महत्त्व रखती है. 
     जब भाग्य अनुकूल रहता है तब किया गया कोई भी कर्म अल्प प्रयास होने पर भी अधिक शुभ फल देता है, वहीँ दूसरी ओर भाग्य के प्रतिकूल होने पर किये गए समस्त प्रयास भी असफल हो जाते हैं और जीवन में अशुभ फल मिलने से नकारात्मकता हावी होने लगती है. 
      श्री मदभागवद गीता में कहा गया है कि किये गए कर्मों का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है.कर्म कभी निष्फल नहीं जाता। अच्छे कर्मों का फल शुभ तथा बुरे कर्मों का फल अशुभ ही होता है. 
     भाग्य को प्रबल और सुखी बनाने के लिए मनुष्य को हमेशा शुभ कर्म ही करने चाहिए, अपने बड़े-बुजुर्गों और गुरुजनों का सम्मान करना चाहिए तथा किसी भी जीव के प्रति हिंसा, अन्याय और अत्याचार करने से बचना चाहिए। इस जन्म में शुभ और सात्विक कर्मों द्वारा मनुष्य अपने को सुखी, संपन्न एवं सदाचारी बनाते हुए अगले जन्म को भी सुफल बना सकता है.-- प्रमोद कुमार अग्रवाल                                                      

Tuesday, August 6, 2013

सूर्य भगवान् के पूजन से मिलता है मनोवांछित फ

 समस्त संसार को अपने प्रकाश से आलोकित करने वाले भगवान् सूर्य का स्मरण और प्रातः पूजन मनोवांछित फल प्रदान करने वाला है। सप्तमी तिथि को भगवान् सूर्य का आविर्भाव हुआ था। इस कारण सप्तमी तिथि भगवान् सूर्य को अत्यंत प्रिय है। किसी भी मास  के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि अथवा किसी सूर्य ग्रहण या मकर संक्रांति के दिन से आरम्भ करके जो भक्त पूर्ण श्रद्धाभाव से भगवान् सूर्य की पूजा अर्चना करता है, उसे समस्त समस्त सुख प्राप्त होने लगते हैं। 
भगवान् सूर्य की प्रातः कालीन आराधना के समय सूर्य देव को जल अर्पित करना, "ॐ खकोल्काय स्वाहा" मन्त्र का जप करते हुए हवन करना, सूर्य से सम्बंधित वस्तुओं जैसे गेंहू, माणिक्य, रक्तवर्ण पुष्प, गुड, केसर, ताम्बा, स्वर्ण, रक्त चन्दन, रक्त कमल, भूमि, भवन आदि का दान करना शुभ होता है। 
वर्ष के बारह मास में भगवान् सूर्य के अलग-अलग नाम एवं रूपों की आराधना की जाती है। चैत्र मास में विशाखा, वैशाख मास में धाता, ज्येष्ठ मास में इंद्र, आषाढ़ मास में रवि, श्रावण मास में नभ, भाद्रपद मास में यम, आश्विन मास में पर्जन्य, कार्तिक मास में त्वष्टा, मार्गशीर्ष मास में मित्र, पौष मास में विष्णु, माघ मास में वरुण तथा फाल्गुन मास में सूर्य नामक भगवान् सूर्य की उपासना की जाती है। 
भगवान् सूर्य  की विधि विधान से सप्तमी तिथि को उपवास करके पूजा करने से सभी प्रकार के कष्टों का निवारण होता है, जीवन में प्रसन्नता आती है और भगवान् सूर्य की कृपा से सभी दोषपूर्ण ग्रहों के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल