Monday, July 15, 2013

19 जुलाई देवशयनी एकादशी पर विशेष :

शुभ फलदायी है भगवान् विष्णु की उपासना 
"सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत सुप्तं भवेदिदम। 
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत सर्वं चराचरम।"
हे जगन्नाथ आपके शयन करने पर यह जगत सुप्त हो जाता है और आपके जग जाने पर सम्पूर्ण चराचर जगत प्रबुद्ध हो जाता है। पीताम्बर, शंख, चक्र और गदा धारी भगवान् विष्णु के शयन करने और जाग्रत होने का प्रभाव दर्शित करने वाला यह मन्त्र शुभ फलदायी है जिसे भगवान् विष्णु की उपासना के समय उच्चारित किया जाता है। 
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को चार मास के लिए देवगण शयन करते हैं। इसीलिए यह तिथि देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहलाती है। पुराणों के अनुसार जब भगवान् सूर्य देव मिथुन राशी में आते हैं, तब भगवान् विष्णु को शयन कराया जाना चाहिए और जब सूर्य देव तुला राशी में प्रवेश करते हैं तब उन्हें विधि पूर्वक जगा देना चाहिए। इस बारे में प्रचलित एक कथा है कि योगनिद्रा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उससे वरदान मांगने को कहा। योगनिद्रा ने भगवान् विष्णु से उनके अंगों में स्थान माँगा। भगवान् विष्णु ने योगनिद्रा को अपने नेत्रों में स्थान देते हुए कहा कि वर्ष में चार मास तक वह उनके आश्रित रहेगी। तभी से भगवान् विष्णु योगनिद्रा को दिए अपने वचन पालन में चार मास तक शेष शय्या पर शयन करते हैं। 
देवशयनी एकादशी के दिन भक्तों को चाहिए कि वे भगवान् विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराकर उच्च आसन पर विराजमान कराएं और वस्त्र, आभूषण, पुष्पहार, चन्दन, रोली, अक्षत, बताशे, पान, सुपारी आदि से भगवान् विष्णु की पूजा अर्चना करें। इस दिन दिन भर व्रत रखें तथा सायं काल में हरिनाम का जप करने के बाद फलाहार कर व्रत का परायण करें। रात्री के समय भगवान् विष्णु को विधिवत शयन कराएं। 
देवशयनी एकादशी से चार मास तक यदि भक्त पवित्र भाव के साथ त्याज्य वस्तुओं का सेवन न करें, अपने धर्म का पालन करें, प्रतिदिन गंगा स्नान करके "ॐ नमो नारायणाय" मन्त्र का जप करते रहे तो उन्हें विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। 
देवशयनी एकादशी के बाद चार मास तक कोई भी शुभ कार्य संपादित नहीं किया जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इन चार मासों में विवाह, यज्ञ, दीक्षा ग्रहण, यज्ञोपवीत संस्कार, गौदान, मूर्ती प्रतिष्ठा आदि शुभ कार्य त्याज्य हैं। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को शयन काल में ही भगवान् विष्णु के करवट बदलने की प्रक्रिया पूजा करके की जानी चाहिए। चातुर्मास का समापन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को होता है। इस दिन विधि विधान से भगवान् विष्णु को मन्त्र जाप करते हुए जगाया जाता है। देवशयनी व्रत का महात्म समस्त भक्तों के लिए शुभ फलदायी है। इसके प्रभाव से भक्तों को सदगति प्राप्त होती है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल