Tuesday, May 14, 2013

13 मई, 2013 : अक्षय तृतीया पर विशेष :

अक्षय तृतीया पर दिया गया दान अक्षय हो जाता है 
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के रूप में जाना जाता है। जन मानस में यह तिथि अक्षय तीज के नाम से प्रसिद्द है। पुराणों के अनुसार इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान, दान, जप, स्वाध्याय, तर्पण आदि करना शुभ फलदायी माना जाता है। इस तिथि में किये गए शुभ कर्मों का कभी क्षय नहीं होता है। अक्षय तृतीया तिथि को सत्ययुग के आरम्भ की तिथि भी माना जाता है , इसीलिए इसे "कृतयुगादि तृतीया" भी कहते हैं। यदि वैशाख शुक्ल की तृतीया तिथि को बुधवार और रोहिणी नक्षत्र भी हों तो वह तिथि सर्वाधिक शुभ और पुण्यदायी होने के साथ-साथ अक्षय प्रभाव रखने वाली हो जाती है।
भविष्य पुराण में दिए गए एक प्रसंग के अनुसार शाकल नगर में रहने वाले धर्म नामक एक धर्मात्मा वणिक अक्षय तृतीया के दिन पूर्ण श्रद्धा भाव से स्नान, ध्यान और दान कर्म किया करता था, जबकि उसकी भार्या उससे मना करती थी। मृत्यु के बाद वह वणिक किये गए दान पुण्य  के प्रभाव से द्वारका नगरी में सर्व सुख संपन्न राजा के रूप में अवतरित हुआ। इस जन्म में भी वह अक्षय तृतीया के पुण्य प्रभाव को भूला नहीं था। राजा के रूप में भी वह अक्षय तृतीया के दिन दान और पितरों को तर्पण अवश्य करता था। 
 अक्षय तृतीया को पवित्र तिथि माना गया है। इस दिन गंगा, यमुना आदि पवित्र नदियों में स्नान करके श्रद्धा भाव से अपने पितरों का तर्पण करना और सामर्थ्य के अनुसार जल एवं अन्न से पूर्ण घट, अनाज, गन्ना, दही, सत्तू, फल, सुराही, हाथ के बने पंखे, वस्त्र आदि का दान करना विशेष फल प्रदान करने वाला माना गया है। मत्स्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन अक्षत, पुष्प, धूप, दीप आदि द्वारा भगवान् विष्णु की आराधना करने से भगवान् विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा संतान भी अक्षय बनी रहती है। 
अक्षय तृतीया के दिन दीन दुखियों की सेवा करना, ग्रीष्म ऋतु से सम्बंधित वस्तुओं का दान करना, पितरों का तर्पण करना, शुभ कर्मों की ओर  अग्रसर रहते हुए मन, वचन और कर्म से अपने मनुष्य धर्म का पालन करना ही अक्षय तृतीया पर्व की सार्थकता है। कलियुग के  नकारात्मक एवं दुष्प्रभाव से बचने के लिए अक्षय तृतीया के दिन भगवान् विष्णु की उपासना करके दान और पितरों को तर्पण अवश्य करना चाहिए, ऐसा करने से निश्चय ही अगले जन्म में समस्त ऐश्वर्य एवं सुख प्राप्त होंगें।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल

No comments: