Tuesday, March 26, 2013

फल्गुनोत्सव मानाने से पूर्ण होते हैं मनोरथ

स्नेह, प्रेम, सद्भाव और राग-रंग का अद्भुत समन्वय है होली का पावन पर्व। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को यह पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। ब्रज क्षेत्र में तो होली की शुरुआत वसंत पंचमी के दिन से ही हो जाती है और पूरे एक मास तक श्रद्धालुओं एवं होली के हुरियारों को रंग, अबीर, गुलाल, पुष्प दल आदि के द्वारा अपने रंगों में रंग लेती है। 
होली की पूर्णिमा से एक दिन पहले होलिका दहन की परंपरा है। कहा जाता है कि  भगवान् विष्णु के परम भक्त प्रहलाद के पिता के आदेशानुसार प्रहलाद की बुआ होलिका उसे अपने साथ लेकर होली की अग्नि में बैठ गयी थी, परन्तु अग्नि से नष्ट न होने के वरदान के बावजूद होलिका अग्नि देव के प्रभाव  से जल कर भस्म हो गयी, जबकि प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुआ। उसी दिन की याद में होलिका दहन की परंपरा है। 
वहीँ, भविष्य पुराण में उल्लेखित एक प्रसंग के अनुसार, सत्ययुग में रघु नाम के एक सर्वगुणसंपन्न एवं शूरवीर राजा थे। उनके राज्य में किसी भी माध्यम से मृत्यु न  होने का वरदान प्राप्त करने वाली  ढ़ोंढा नाम की एक अति सुन्दर राक्षसी बच्चों और प्रजाजनों को प्रताड़ित किया करती थी। उसे शांत करने के लिए अडाडा  मंत का जोर-जोर से उच्चारण किया जाता था। इस राक्षसी से छुटकारा पाने के लिए राजा रघु ने नगरवासियों  को आदेश दिया कि वे फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को अग्नि प्रज्वलित कर उसके चारों ओर तलवार आदि हथियार लेकर परिक्रमा लगायें, अडाडा  मन्त्र का उच्चारण करते हुए उत्सव मनाएं तथा हास-परिहास करें। राजा के कहे अनुसार जब नगरवासियों ने ऐसा ही किया तो उसके प्रभाव से उस राक्षसी का अंत हो गया। तभी से होलिका दहन और राग-रंग का उत्सव मनाया जाने लगा। 
होलिका दहन के पश्चात जब चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि का आगमन होता है तब, प्रातः काल में नित्य कर्मों से निवृत्त होने के बाद समस्त दोषों की शांति के लिए होलिका की विभूति को अपने शरीर पर लगाने तथा पितरों एवं देवताओं के लिए तर्पण करने का विधान है। इसके लिए घर के आँगन में चौक पूर कर उस पर कलश की स्थापना की जाती है और दुग्ध, दही, घृत, पुष्प, श्री खंड, श्वेत चन्दन, फल आदि अर्पित करते हुए पूजा की जाती है। 
जीवन में सुख, समृद्धि, सौभाग्य, आयु, विद्या, पुत्र, पुत्र, धन-धान्य आदि की कामना करते हुए इस प्रकार मनाया गया फल्गुनोत्सव सदैव शुभ फलदायी होता है। इस दिन श्रद्धाभाव  से विष्णु भगवान् और माता लक्ष्मी जी का स्मरण करने से सभी कष्टों का निवारण तो होता ही है, साथ ही समस्त मनोरथ भी पूर्ण होते हैं। - प्रमोद कुमार अग्रवाल

No comments: