Tuesday, March 26, 2013

भगवान् शिव की आराधना से होता है कल्याण

अपनी विशिष्ट महिमा और ज्योति से इस नश्वर संसार को प्रकाशित करके अधर्म का नाश करने वाले भगवान् शिव की पूजा अर्चना सम्पूर्ण विश्व में श्रृद्धा भाव से होती है। प्रतिमा, चित्र एवं लिंग के रूप में पूजनीय भगवान् शिव सभी का कल्याण करने वाले देव हैं। देश के अलग-अलग भागों में भगवान् शिव बारह जोतिर्लिंगों के रूप में न सिर्फ विराजमान हैं बल्कि उनके दर्शन के लिए देश विदेशों से भक्तजन आते हैं। 
 भगवान् शिव  सभी भक्तों के लिए सहज सुलभ हैं। बिल्व पात्र, पुष्प, फल, धतूरा, भांग, गंगा जल, दुग्ध, घृत, शहद, अन्न आदि से प्रसन्न होने वाले  भगवान् शिव  अपने भक्तों को सुख, समृद्धि, शांति, प्रेम, दया  रुपी आशीर्वाद प्रदान करते हैं।  लिंग रूप में भगवान् शिव निर्माण, पोषण और संहार के देव हैं।
 स्कन्द पुराण के अनुसार अनंत आकाश, लिंग ही है। ऋग्वेद में भी लिंग की उपासना का उल्लेख मिलता है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के अलावा दशानन रावण द्वारा भी शिव लिंग की उपासना करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया गया था। कूर्म पुराण में  भगवान् शिव ने स्वयं को विष्णु और देवी माना है। इस कारण  भगवान् शिव को देवाधिदेव महादेव भी कहा जाता है।
हमारे पुरातन धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव ने संसार को न्याय, प्रेम और शांति का सन्देश दिया था। उन्होंने अत्याचार का अंत करके अपने भक्तों को अभय दान दिया। पवनपुत्र हनुमान और भैरव के रूप में भगवान शिव ने जगत का कल्याण ही किया। महाशिवरात्रि पर्व भगवान शिव की उपासना का विशेष पर्व है, इस दिन निराहार रहकर भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती है। रात्रि जागरण करके भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए यह दिन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन जो भक्त भगवान शिव की पूर्ण श्रद्धा भाव से आराधना करता है, उसे धन, धन्य, ज्ञान, बुद्धि, विवेक, संतान सुख, दीर्घायु एवं मोक्ष प्राप्त होते हैं। जीवन में आये दिन होने वाले तनाव और समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए महाशिवरात्रि पर्व पर भगवान शिव का मन्त्र जप करना शुभ होता है। अकाल मृत्यु से बचने के लिए इस दिन विधि-विधान से महा मृत्युंजय मन्त्र का जप अवश्य करना चाहिए। इसके अलावा "ॐ नमः शिवाय" का जोर-जोर से उच्चारण करने मात्र से मनुष्य को चमत्कारिक प्रभाव मिलने लगते हैं। गरल विष पान करके देवताओं की रक्षा करने वाले भगवान शिव की महिमा अपरम्पार है। सर्वव्यापी, पापियों के संहारक, देवताओं में श्रेष्ठ, भक्तों का कल्याण करने वाले भगवान शिव की उपासना और आराधना करना , समस्त कष्टों एवं ग्रह, नक्षत्रों के दोष और अशुभ प्रभाव को दूर करने वाला है।- प्रमोद कुमार अग्रवाल 

फल्गुनोत्सव मानाने से पूर्ण होते हैं मनोरथ

स्नेह, प्रेम, सद्भाव और राग-रंग का अद्भुत समन्वय है होली का पावन पर्व। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को यह पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। ब्रज क्षेत्र में तो होली की शुरुआत वसंत पंचमी के दिन से ही हो जाती है और पूरे एक मास तक श्रद्धालुओं एवं होली के हुरियारों को रंग, अबीर, गुलाल, पुष्प दल आदि के द्वारा अपने रंगों में रंग लेती है। 
होली की पूर्णिमा से एक दिन पहले होलिका दहन की परंपरा है। कहा जाता है कि  भगवान् विष्णु के परम भक्त प्रहलाद के पिता के आदेशानुसार प्रहलाद की बुआ होलिका उसे अपने साथ लेकर होली की अग्नि में बैठ गयी थी, परन्तु अग्नि से नष्ट न होने के वरदान के बावजूद होलिका अग्नि देव के प्रभाव  से जल कर भस्म हो गयी, जबकि प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हुआ। उसी दिन की याद में होलिका दहन की परंपरा है। 
वहीँ, भविष्य पुराण में उल्लेखित एक प्रसंग के अनुसार, सत्ययुग में रघु नाम के एक सर्वगुणसंपन्न एवं शूरवीर राजा थे। उनके राज्य में किसी भी माध्यम से मृत्यु न  होने का वरदान प्राप्त करने वाली  ढ़ोंढा नाम की एक अति सुन्दर राक्षसी बच्चों और प्रजाजनों को प्रताड़ित किया करती थी। उसे शांत करने के लिए अडाडा  मंत का जोर-जोर से उच्चारण किया जाता था। इस राक्षसी से छुटकारा पाने के लिए राजा रघु ने नगरवासियों  को आदेश दिया कि वे फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को अग्नि प्रज्वलित कर उसके चारों ओर तलवार आदि हथियार लेकर परिक्रमा लगायें, अडाडा  मन्त्र का उच्चारण करते हुए उत्सव मनाएं तथा हास-परिहास करें। राजा के कहे अनुसार जब नगरवासियों ने ऐसा ही किया तो उसके प्रभाव से उस राक्षसी का अंत हो गया। तभी से होलिका दहन और राग-रंग का उत्सव मनाया जाने लगा। 
होलिका दहन के पश्चात जब चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि का आगमन होता है तब, प्रातः काल में नित्य कर्मों से निवृत्त होने के बाद समस्त दोषों की शांति के लिए होलिका की विभूति को अपने शरीर पर लगाने तथा पितरों एवं देवताओं के लिए तर्पण करने का विधान है। इसके लिए घर के आँगन में चौक पूर कर उस पर कलश की स्थापना की जाती है और दुग्ध, दही, घृत, पुष्प, श्री खंड, श्वेत चन्दन, फल आदि अर्पित करते हुए पूजा की जाती है। 
जीवन में सुख, समृद्धि, सौभाग्य, आयु, विद्या, पुत्र, पुत्र, धन-धान्य आदि की कामना करते हुए इस प्रकार मनाया गया फल्गुनोत्सव सदैव शुभ फलदायी होता है। इस दिन श्रद्धाभाव  से विष्णु भगवान् और माता लक्ष्मी जी का स्मरण करने से सभी कष्टों का निवारण तो होता ही है, साथ ही समस्त मनोरथ भी पूर्ण होते हैं। - प्रमोद कुमार अग्रवाल

Tuesday, March 12, 2013

प्रसाद ग्रहण करें तो रखें ध्यान

विभिन्न धार्मिक एवं पारिवारिक अनुष्ठानों के समापन तथा देवी-देवताओं की पूजा आरती के पश्चात प्रसाद वितरण और प्रसाद ग्रहण करने का विशेष महत्त्व होता है। प्रसाद के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ भक्तों एवं श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित करने तथा प्रसाद ग्रहण करने से मन को असीम शान्ति एवं प्रसन्नता का अनुभव होता है। भगवान् के मंदिर में भी हम प्रसाद चढ़ाते हैं और वहां प्रसाद का कुछ भाग  उपस्थित श्रद्धालुओं को भी बांटते हैं। 
प्रसाद ग्रहण करने का सही तरीका हमें भगवान् की कृपा का पात्र बनता है। जब भी हमें किसी देवी-देवता के पूजन के उपरान्त प्रसाद प्राप्त हो, पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उन देवी-देवता का ध्यान लगाते हुए प्रसाद को अपने मस्तक से लगाकर प्रसन्न भाव से उसे ग्रहण करना चाहिए। प्रसाद को कभी भी ज़मीन पर नीचे नहीं गिराना चाहिए। प्रसाद को झूठा भी नहीं छोड़ना चाहिए। प्रसाद का भूल कर भी अपमान नहीं करना चाहिए। 
यदि व्रत, उपवास अथवा अन्य कारणों से प्रसाद ग्रहण न करना हो तो भी प्रसाद को ग्रहण करने से इन्कार नहीं करना चाहिए बल्कि दिया गया प्रसाद प्राप्त करके अपने पास रख लेना चाहिए। यदि प्रसाद की प्रकृति शीघ्र खराब होने वाली हो तो उसे किसी बच्चे या भक्त को दे देना चाहिए। 
प्रसाद के साथ तुलसी दल प्राप्त हो तो तुलसी दल को दांतों से चबाये बिना ग्रहण करना चाहिए। यदि किसी कारण से प्रसाद ज़मीन पर गिर गया हो तो तत्काल भगवान् से क्षमा याचना करते हुए प्रसाद को एकत्र कर गौ माता को खिला देना चाहिए। इस प्रकार एकत्र किये गए प्रसाद को बाहर फेंकना घोर पाप होता है। जानबूझ कर प्रसाद का तिरस्कार करना, पेरों से ठुकराना, प्रसाद ग्रहण करते समय अपवित्र  विचार रखना भी अनुचित माना जाता है। भगवान् के प्रति पूर्ण भक्ति-भाव और विश्वासपूर्ण आस्था रखते हुए प्रसाद ग्रहण करने वालों पर भगवान् की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा  इससे जीवन में सदैव शुभता आती है। --- प्रमोद कुमार अग्रवाल