Friday, October 19, 2012

मंत्र शक्ति का चमत्कार

दुःख व चिंताओं को दूर करके शांति और आनंद का अनुभव करने, तन व मन को स्वस्थ बनाये रखने, बुद्धि एवं कार्य करने की शक्ति में वृद्धि करने तथा वृद्धावस्था को दूर रखने के लिए एक चमत्कारी मंत्र है :

                                " ॐ श्री प्रकाशम् " .
दिल्ली के योगाचार्य श्री कृष्ण गोयल द्वारा हमें यह मंत्र भेजा गया है. श्री गोयल के अनुसार इस मंत्र का मन ही मन जाप करने के लिए एकांत जगह को चुनें और अपनी आँखों को धीमे से मूँद कर अपने ध्यान को मंत्र की शांत तरंगों पर केन्द्रित करें. जाप करते समय अपने होंठ व जीभ को न हिलाएं. पांच मिनट जाप करने के बाद आराम से बैठ कर महसूस करें कि आपका शरीर शांति की मूर्ति बन गया है , शरीर में अपार ऊर्जा व शक्ति का संचार हो गया है तथा सम्पूर्ण शरीर में एक अनोखा प्रकाश भर गया है. इस मंत्र के निरंतर जाप एवं अभ्यास से हमें आन्तरिक प्रकाश का दर्शन होने लगेगा और तब धीरे - धीरे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में आशातीत लाभ होगा.-- प्रमोद कुमार अग्रवाल

आदित्य स्तोत्र के पाठ से मिलते हैं चमत्कारिक फल

जीवन में अचानक बाधाएं, कष्ट, रोग, शत्रु बाधा, असफलता, पारिवारिक तनाव जेसी समस्याएं आने लगती हैं तो मनुष्य अपनी जन्म कुंडली में छिपे रस्यों के अनुसार ग्रह-नक्षत्रों की शांति के उपाय करता है। एसा करने से सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगते हैं। सूर्य ग्रह के दोष की वजह से ह्रदय रोग होने की आशंका सबसे ज्यादा रहती है। इससे बचने के लिए स्वर्ण धातु की अंगूठी पहनने की सलाह दी जाती है।
आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से करते रहने से भी ह्रदय रोग में आशातीत लाभ मिलता है। आदित्य ह्रदय स्तोत्र के पाठ से मिर्गी, ब्लडप्रेशर मानसिक रोग आदि भी ठीक होने लगते हैं। आदित्य ह्रदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास में वृद्धि होने के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता व सिद्धि मिलने लगती है।
आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ आरम्भ करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार का दिन शुभ माना गया है। इसके बाद आने वाले प्रत्येक रविवार को यह पाठ करते रहना चाहिए। इस दिन सूर्य देवता की धूप, दीप, लाल चन्दन, लाल कनेर के पुष्प, घृत आदि से पूजन करके उपवास रखना चाहिए। सांयकाल आटे से बने मीठे हलवे का प्रसाद लगाकर उसे ग्रहण करना चाहिए।
सूर्य देव के प्रति पूर्ण श्रद्धाभाव एवं विश्वास के साथ नियम पूर्वक उनकी उपासना व आराधना करते रहने से चमत्कारिक फल मिलने लगते हैं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल

वेदों का नेत्र है ज्योतिष शास्त्र

ज्योतिष शास्त्र को वेदों का नेत्र माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर जन्म कुंडली के विभिन्न भावों में बैठे ग्रहों के अनुसार जातक के जीवन के सम्बन्ध में जानकारी की जा सकती है। ज्योतिष शास्त्र भविष्य का निर्धारण नहीं करता बल्कि जन्म कुंडली में जो रहस्य छिपे हैं सिर्फ उन्हें स्पष्ट करता है। यदि जातक की कुंडली में ग्रहों की स्थिति दोषपूर्ण है तो ज्योतिष शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार उन दोषों के निवारण के लिए कुछ उपाय करके जीवन को सुखी, संपन्न और कष्ट रहित बनाया जा सकता है। लेकिन इतना अवश्य याद रखना चाहिए कि जीवन में जो भी कुछ घटता है अथवा घटित होने वाला है वह तो होगा ही क्योकि ईश्वर ने जो भी मनुष्य के भाग्य में लिखा है उसे न तो जाना ही जा सकता है और न ही उस पर अंकुश लगाया जा सकता है, हाँ इतना अवश्य है कि ज्योतिष ज्ञान के माध्यम से मनुष्य के जीवन की व्यक्तिगत, पारिवारिक, व्यावसायिक, शेक्षिक आदि क्षेत्र की समस्याओं की पूर्व जानकारी हो जाने से वे अपने को उस समस्या या कष्ट का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर सकते हैं और बताये गए उपायों के द्वारा उनके प्रभाव को कम कर सकते हैं.
-- प्रमोद कुमार अग्रवाल

पंचक विचार और ज्योतिष

ज्योतिष शास्त्र में पांच नक्षत्रों के समूह को पंचक कहते हैं। ये नक्षत्र हैं धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती।ज्योतिष विज्ञान के अनुसार चंद्रमा अपनी माध्यम गति से 27 दिनों में सभी नक्षत्रों का भोग कर लेता है। इसलिए प्रत्येक माह में लगभग 27 दिनों के अंतराल पर पंचक नक्षत्र आते रहते हैं।
पंचक नक्षत्रों के समूह में धनिष्ठा तथा सदभिषा नक्षत्र चर संज्ञक कहलाते हैं। इसी प्रकार पूर्व भाद्रपद को उग्र संज्ञक, उत्तरा भाद्रपद को को ध्रुव संज्ञक और रेवती नक्षत्र को मृदु संज्ञक माना जाता है। ज्योतिषविदों के अनुसार चर नक्षत्र में घूमना-फिरना, मनोरंजन, वस्त्र और आभूषणों की खरीद-फरोक्त करना अशुभ नहीं माना गया है। इसी तरह ध्रुव संज्ञक नक्षत्र में मकान का शिलान्यास, योगाभ्यास और लम्बी अवधि की योजनाओं का क्रियान्वन भी किया जा सकता है।
मृदु संज्ञक नक्षत्र में भी गीत, संगीत, फिल्म निर्माण, फेशन शो, अभिनय करने जैसे कार्य किये जा सकते हैं। उग्र संज्ञक नक्षत्र में अदालत में लंबित मुकदमों तथा विभिन्न प्रकार के वाद-विवादों का निपटारा किया जा सकता है।
पंचक काल में विवाह, मुंडन, उपनयन संस्कार, गृह प्रवेश, गृह निर्माण और व्यावसायिक कार्य किये जा सकते हैं। पंचक काल में यदि कोई कार्य किया जाना अति आवश्यक हो तो इसके लिए पंचक दोष की शांति के निवारण का उपाय अवश्य कर लेना चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र की मान्यता के अनुसार पंचक के दिनों में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर दाह - संस्कार की क्रिया से पूर्व मृतक के शव पर पांच पुतले बना कर रखे जाने का विधान है।
पंचक के दिनों में लकड़ी के फर्नीचर बनाना और खरीदना व बेचना, दक्षिण दिशा में यात्रा करना, चारपाई बनाना जैसे कार्यों पर प्रतिबन्ध बताया गया है, लेकिन यदि ऐसा करना आवश्यक हो तो नक्षत्र की स्थिति के अनुसार पंचक दोष के निवारण का उपाय अवश्य कर लेना शुभ रहता है।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल

जन्म कुंडली और पितृ दोष

जन्म कुण्डली में सूर्य के पीड़ित होने को पितृ दोष कहा जाता है। पितृ दोष के कारण जातक को धन हानि, संतान कष्ट, संतान जन्म में बाधाएं जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

कुण्डली का दशम भाव पिता से सम्बन्ध रखता है। दशम भाव का स्वामी यदि कुण्डली के छटे, आठवें अथवा बारहवें भाव में बैठा हो तथा गुरु पाप ग्रह से प्रभावित हो अथवा पापी ग्रह की राशि में हो और लग्न व पांचवे भाव के स्वामी पाप ग्रह से सम्बन्ध बनाते हों तो भी पितृ दोष माना जाता है।
पंचम भाव का स्वामी यदि सूर्य हो और वह पाप ग्रह की श्रेणी में हो तथा त्रिकोण में पाप ग्रह हो अथवा उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो इसे पितृ दोष प्रभावित कहा जाता है।
कमजोर लग्न का स्वामी यदि पांचवें भाव में हो और पांचवें भाव का स्वामी सूर्य से सम्बन्ध बनाता है तथा पंचम भाव में पाप ग्रह में हो तो भी पितृ दोष कहलाता है।
अष्टम भाव में सूर्य, पंचम भाव में शनि, लग्न में पाप ग्रह और पंचम भाव के स्वामी के साथ राहु स्थित हो तो पितृ दोष के कारण संतान सुख में कमी आती है।
कुंडली में सूर्य-शनि, सूर्य-राहू का योग केंद्र त्रिकोण 1, 4, 5, 7, 9, और 10 भाव में हो अथवा लग्न का स्वामी 6, 8, या 12 भाव में हो एवं राहु लग्न भाव में हो तो इसी कुण्डली भी पितृ दोष युक्त होती है।
कुण्डली में स्थित पितृ दोष को दूर करने के लिए जातक को प्रत्येक अमावस्या को पितरों की पूजा करनी चाहिए। अपने बड़े-बुजुर्गों, गरीब और जरूरतमंदों की सेवा व सहायता करने से भी पितृ दोष का निवारण होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद

व्यापार को बुरी नज़र से बचाता है नज़र बट्टू

 दुकानदारी, व्यवसाय और प्रतिष्ठान को किसी की बुरी नज़र से बचाने के लिए दुकानदार एवं व्यापारी कई उपाय करते हैं। शनिवार के दिन नीबू और मिर्च से बनी माला का प्रयोग भी बहुतायत में किया जाता है। इसे नज़र बट्टू कहा जाता है।
इसे बनाने के लिए मोटे व काले रंग के धागे में एक ताज़ा नीबू और पाँच या सात की संख्या में ताज़ा मिर्चों को पिरोकर दुकान, व्यवसाय स्थल और कार्यालयों के मुख्य या प्रवेश द्वार पर लटका दिया जाता है। इस प्रकार बनाया गया नज़र बट्टू एक हफ्ते तक लगा रहता है और दोबारा शनिवार के दिन ही बदला जाता है।
ऐसा माना जाता है कि इस प्रयोग से व्यापार या दुकानदारी को किसी की बुरी नज़र अथवा हाय नहीं लगती है तथा उस स्थान पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह भी नहीं होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल

दीपक जलाना होता है शुभ

अपने इष्ट देवी-देवताओं की पूजा अर्चना और आरती के समय दीपक, धूपबत्ती, अगरबत्ती आदि जलाने की परंपरा है। वास्तु शास्त्र के अनुसार ऐसा करने से उस स्थान की नकारात्मक ऊर्जा और वास्तु दोष में कमी आने लगती है, सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होने के साथ-साथ वातावरण पवित्र एवं शुद्ध बना रहता है।
पूजा गृह में दीपक प्रज्वलित करने के लिए हमेशा नई और पवित्र रुई से बने कँवल या बत्ती तथा शुद्ध घी, सरसों या तिली के तेल को ही उपयोग में लाना चाहिए। पुरानी और पहले से ही किसी अन्य कार्य में प्रयुक्त रुई और अशुद्ध व झूठे घी व तेल का उपयोग पूजा तथा आरती के लिए नहीं करना चाहिए। ऐसा करना शास्त्रों के अनुसार निषिद्ध माना गया है।
दीपक को कभी भी ज़मीन पर नहीं रखना चाहिए बल्कि उसे रोली या चावल का सतिया बना कर उस पर प्रज्वलित करना चाहिए। दीपक प्रज्वलित करते समय समस्त जीव-जंतुओं एवं पादपों के कल्याण और सुख-समृद्धि की सच्चे हृदय से कामना अवश्य करनी चाहिए। ऐसा करने से सर्व शक्तिमान ईश्वर का आशीर्वाद मिलता है।
पूजा गृह, घर, प्रतिष्ठान अथवा किसी संस्थान में दीपक प्रज्वलित करके ईश्वर का ध्यान करते समय निम्न मन्त्र का जाप करना शुभ एवं कल्याणकारी होता है:
शुभम करोतु कल्याणंमारोग्यं सुख सम्पदम .
शत्रु बुद्धि विनाशायं च दीप ज्योतिर्नमोस्तुते।
-- प्रमोद कुमार अग्रवाल

वास्तु शास्त्र और दिशा ज्ञान

वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी भवन अथवा स्थान की दृष्टि से एक मध्य स्थान और आठ दिशाएं होती हैं। इन सभी दिशाओं का अपना अलग-अलग महत्त्व है।
जिस दिशा से सूर्य देवता उदय होते हैं वह पूर्व दिशा होती है। इस दिशा के स्वामी इंद्र भगवान हैं। पूर्व दिशा अग्नि तत्व है जिसे कभी भी बंद नहीं करना चाहिए। इस दिशा को बंद करने से वहां रहने वालों को कष्ट, अपमान, ऋण, कार्यों में रुकावट और पितृ दोष का सामना करना पड़ता है।

सूर्य देवता के अस्त होने की दिशा पश्चिम है। इस दिशा के स्वामी वरुण देवता और तत्व वायु हैं। इस दिशा को बंद करने से जीवन में असफलता, शिक्षा में रूकावट, मानसिक तनाव, धन की कमी, मेहनत के बावजूद लाभ न मिलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
उत्तर दिशा जल तत्व से सम्बन्ध रखती है। इस दिशा के स्वामी कुबेर हैं। इस दिशा में कोई भारी सामान नहीं रखना चाहिए और न ही इसे बंद करना चाहिए। धन रखने वाली तिजोरी का मुख सदैव उत्तर दिशा में ही खुलना शुभ माना गया है। इस दिशा को पवित्र और खुला रखने से धन, धान्य, सुख, समृद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है।
पृथ्वी तत्व से सम्बंधित दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं। इस दिशा को सदैव बंद रखना ही शुभ माना जाता है। यदि इस दिशा में खिड़की हों तो उन्हें बंद रखना ही श्रेष्ठकर है। इस दिशा में कभी भी पैर करके नहीं सोना चाहिए।
वास्तु शास्त्र के अनुसार उत्तर - पूर्व दिशा को ईशान कोण माना गया है। जल तत्व से सम्बन्ध रखने वाली इस दिशा के स्वामी रूद्र हैं। इस दिशा को भी सदैव पवित्र रखना चाहिए अन्यथा घर परिवार में कलह और कष्ट होने के साथ-साथ कन्या संतान अधिक होने की सम्भावना भी बनी रहती है।
दक्षिण - पूर्व दिशा को वास्तु शास्त्र में आग्नेय कोण माना गया है। अग्नि तत्व से सम्बंधित इस दिशा के स्वामी अग्नि देवता हैं। यदि इस दिशा को दूषित रखा जाए तो घर में बीमारियाँ और अग्निकांड होने का खतरा बना रहता है। इस दिशा में बिजली के मीटर, विद्युत् उपकरण और गैस चूल्हा आदि रहने चाहिए।
दक्षिण-पश्चिम दिशा को वास्तु शास्त्र में नैरित्य कोण कहा जाता है। इस दिशा का सम्बन्ध पृथ्वी तत्व से है और इस दिशा के स्वामी नैरूत हैं। इस दिशा के दूषित होने से चरित्र हनन, शत्रु भय, भूत-प्रेत बाधा, दुर्घटना जैसी समस्याओं का सामना करना पड सकता है।
वास्तु शास्त्र में उत्तर-पश्चिम दिशा को वायव्य कोण का नाम दिया गया है। वायु तत्व वाली इस दिशा के स्वामी भी वरुण देवता हैं। इस दिशा के पवित्र रहने से घर में रहने वालों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है और उनकी आयु भी अच्छी रहती है।
वास्तु शास्त्र में भवन का मध्य भाग सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह भाग ब्रम्हा का होने से इसे सदैव खुला और खाली रखने की सलाह दी जाती है। आकाश तत्व वाले इस पवित्र स्थान के स्वामी सृष्टि के रचियता ब्रह्मा जी हैं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल



जन्म राशि के अनुसार करें आराधना

प्रत्येक मनुष्य मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए अपने इष्ट देवी-देवता की पूजा अर्चना करता है। अपनी जन्म राशि के अनुसार यदि अपने इष्ट देवी-देवता की पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से आराधना की जाये तो जीवन में अच्छे परिणाम देखने को मिल सकते हैं। यहाँ हम समस्त बारह जन्म राशियों के अनुसार इष्ट देवी-देवता की आराधना करने के सम्बन्ध में चर्चा कर रहे हैं।
मेष और वृश्चिक राशि :
इन दोनों राशियों के स्वामी ग्रह मंगल हैं। इन राशि के जातकों को पवनसुत हनुमानजी, महा काली और तारा देवी की आराधना करने के साथ-साथ दुर्गा सप्तशती में दिए गए देवीजी के प्रथम चरित्र का पाठ करना शुभ फलदायी होता है।
वृष और तुला राशि :
इन दोनों राशियों के स्वामी ग्रह शुक्र हैं, जो रजो गुण प्रधान हैं। इन जातकों को ज्ञान की देवी सरस्वती जी की आराधना करना शुभ होता है।
मिथुन और कन्या राशि :
इन राशियों के स्वामी ग्रह बुध हें। बुध भी रजो प्रधान ग्रह हैं। इन जातकों को माता दुर्गा और भुवनेश्वरी देवी जी की आराधना करना शुभ फलदायी माना गया है।

कर्क राशि :
इस राशि के स्वामी सतो गुण प्रधान चन्द्र ग्रह हैं। इस राशि के जातकों को धन की देवी महालक्ष्मी जी की आराधना करनी चाहिए।

सिंह राशि :
इस राशि के स्वामी सतोगुण प्रधान ग्रह सूर्य है। इस राशि के जातकों को सूर्य भगवान्, धन की देवी महालक्ष्मी , बगला मुखी एवं सिद्धिदात्री देवी की आराधना करनी चाहिए।
धनु और मीन राशि :
इन दोनों राशियों के स्वामी ग्रह गुरु अर्थात ब्रहस्पति हैं। ये सतो गुण प्रधान हैं। इन दोनों राशियों के जातकों के लिए महालक्ष्मी, कमला और सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना फलदायी होता है।
मकर और कुम्भ राशि :
इन दोनों राशिओं के स्वामी ग्रह शनि हैं जो तमो प्रधान गुण रखते हैं। इन जातकों को शनि देव और महाकाली जी की उपासना करनी चाहिए। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद












वक्री हुए बृहस्पति ग्रह, शिक्षा और अर्थव्यवस्था में प्रगति होगी

शिक्षा, धर्म और अध्यात्म के करक ग्रह बृहस्पति ने 4 अक्टूबर की शाम 6:50 से वृष राशि में विपरीत दिशा में चलना आरम्भ कर दिया है अर्थात बृहस्पति ग्रह वक्री हो गए हैं। देवगुरु बृहस्पति अगले वर्ष 30 जनवरी, 2013 को वक्री से मार्गी होंगे। समस्त ग्रहों में सौम्य माने जाने वाले बृहस्पति ग्रह का वर्तमान वक्री प्रभाव शुभ फल दायक है। शास्त्रों के अनुसार सौम्य ग्रह वक्री होने पर भी महा शुभ फलदायी होते हैं।

बृहस्पति ग्रह के वक्री प्रभाव से लोगों में धार्मिक भावना में वृद्धि होगी, शिक्षा, विशेष रूप से तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति होगी, और शिक्षा से सम्बंधित विभागों में बेरोजगारों को नौकरी के पर्याप्त अवसर उपलब्ध होंगे। बृहस्पति के शुभ प्रभाव से पीतल और स्वर्ण धातु के व्यवसाय में व्यापारियों को लाभ की संभावनाए बनेंगी।
बृहस्पति ग्रह अर्थव्यवस्था पर भी अपना अधिकार रखते हैं, अतः देश की अर्थव्यवस्था में भी सुधार होना संभावित है।
वक्री बृहस्पति के प्रभाव से मेष, वृष, सिंह, कन्या, वृश्चिक और मकर राशियों के जातकों को लाभ होगा, जबकि मिथुन, तुला और कुम्भ राशि के जातकों को अशुभ फल मिलेंगें। कर्क, धनु और मीन राशि के जातकों के लिए वक्री बृहस्पति सामान्य फलदायी होंगे। --प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिष विद्या विशारद (वाराणसी)

वृश्चिक राशि में मंगल के प्रवेश से मिलेंगे मिश्रित फल

सौर मंडल में भूमि पुत्र के नाम से प्रसिद्ध मंगल ग्रह 9 नवम्बर तक के लिए अपनी स्व राशि वृश्चिक में रहेंगे। मंगल ग्रह के अपनी राशि में आने से ज़मीन-जायदाद के व्यवसाय, भवन निर्माण, धातुओं के व्यापार और शेयर बाज़ार का कारोबार करने वालों को विशेष लाभ पहुँचेगा।

मंगल ग्रह के स्व राशि में आने के इस महत्वपूर्ण योग के प्रभाव से धन-धान्य के उत्पादन, गुड, चीनी, वनस्पति एवं शुद्ध घी, तेल तथा अन्य तरल पदार्थों के व्यापारियों को आर्थिक लाभ मिलेगा। इसके अलावा इस योग से जनता के जीवन में क्रय शक्ति में वृद्धि होगी।
मंगल ग्रह के वृश्चिक राशि में प्रवेश का असर विभिन्न राशियों पर अलग-अलग देखा जा सकता है। वृष, कर्क, तुला, वृश्चिक, कुम्भ और मीन राशि के जातकों को लाभ होगा, वहीँ मेष, सिंह और धनु राशि के जातकों के लिए यह योग अशुभ फल देगा। मिथुन, कन्या एवं मकर राशि के जातकों के लिए इस योग का प्रभाव सामान्य फल देने वाला होगा।
चूँकि वृश्चिक राशि में पहले से ही राहू ग्रह विराजमान है, ऐसी दशा में वृश्चिक राशि में मंगल ग्रह के साथ राहू की युति के प्रभाव से वर्ग-संघर्ष, जन आन्दोलन, धरना, प्रदर्शन, घिराव और प्राकृतिक आपदाएं घटित होने संभावनाएं हो सकती हैं।ज्योतिष शास्त्र में इस योग को अंगारक योग के नाम से जाना जाता है। - प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद

वास्तु अनुरूप लगायें पौधे

वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार यदि घर के अन्दर और आसपास पेड़-पोधे लगाये जाएँ तो उसके शुभ परिणाम मिलते हैं। घर की पूर्व दिशा में पीपल, दक्षिण दिशा में पलाश, पश्चिम दिशा में वट और उत्तर दिशा में उदुम्बर के पेड़ कभी नहीं लगाने चाहिए अन्यथा गृह स्वामी को सदैव समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। पश्चिम दिशा में लगाया गया पीपल का पेड़ धन-धान्य की प्राप्ति कराता है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार नैरित्य और आग्नेय कोण में उद्यान और बगीचा नहीं लगाना चाहिए। घर के अन्दर बने बगीचे में नीलिमा एवं हरिद्रा लिए हुए पौधे लगाने से धन और संतान की हानि होने की आशंका बनी रहती है। इसी प्रकार घर के पास फलदार, कांटेदार और दूधदार पौधे भी नहीं लगाने चाहिए।
घर के अन्दर बेर, केला, अनार, अरण्डी तथा कांटेदार पेड़ लगाने से उस घर की संतानों का विकास बाधित होने के साथ-साथ गृह स्वामी को शत्रुभय बना रहता है तथा आर्थिक तंगी भी बनी रहती है। जिस पौधे में फल, दूध और कांटे तीनों ही मौजूद हों तो उसे भूलकर भी घर के अन्दर नहीं लगाना चाहिए अन्यथा घर के सदस्यों को काल का भय बना रहता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल