Friday, September 21, 2012

घर बैठे ही लें ज्योतिष में पत्राचार से प्रशिक्षण

भारतीय वैदिक ज्योतिष संस्थानम (रजिस्टर्ड), वाराणसी (उत्तर प्रदेश) से अपने घर बैठे- बैठे ज्योतिष शास्त्र की विभिन्न विधाओं जैसे - फलित ज्योतिष,  हस्तरेखा, वास्तु,  रत्न  ज्योतिष,  तंत्र-मन्त्र, अंक ज्योतिष,  ज्योतिष धन्वन्तरी,  कर्मकांड आदि में पत्राचार से प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए कृपया मोबाइल नम्बर  :  09412155627 पर संपर्क कर सकते है। (न्यूज़लाइन समाचार )













ज्योतिष शास्त्र और भविष्य

ज्योतिष शास्त्र और भविष्य मनुष्य को हमेशा से ही अपने भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने की जिज्ञासा रही है। इसके लिए वह ज्योतिष शास्त्र की विभिन्न विधाओं जैसे हस्तरेखा, जन्म कुंडली, अंक विज्ञान आदि का सहारा लेता है और इस विधा के जानकार लोगों से संपर्क करने की कोशिश करता है। वहीँ कुछ लोग ज्योतिष शास्त्र को अविश्वास की नज़र से देखते हैं और इस शास्त्र से जुड़े लोगों का उपहास उड़ाते हैं, लेकिन ऐसे लोग भी अपने घर परिवार में किसी बच्चे के जन्म , मांगलिक कार्यक्रम, लड़के अथवा लडकी के विवाह आदि से पहले कुंडली मिलवाते हैं और इस विधा के जानकार लोगों की तलाश करते हैं।
वास्तव में देखा जाये तो ज्योतिष शास्त्र सौर मंडल में स्थित ग्रह, नक्षत्रों के हमारे जीवन पर प्रभाव से जुड़ा विज्ञानं है. बच्चे के जन्म के साथ ही उस समय मौजूद ग्रह और नक्षत्र के आधार पर उसके समस्त जीवन का निर्धारण हो जाता है।
सही-सही जन्म समय , जन्म स्थान और जन्म की तिथि के आधार पर बनी हुई जन्म कुंडली किसी भी जातक के सम्पूर्ण जीवन से जुडी गूढ़ से गूढ़ बातों की जानकारी दे देती है। वहीँ दूसरी ओर हमारे हाथ की रेखाओं में भी जीवन से जुडी बहुत सी रहस्यमयी बातें छिपी होती हैं।
जन्म कुंडली और हाथ की रेखाओं के समुचित विश्लेषण से हम वर्तमान और भविष्य के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। बस ज़रुरत है इस सर्व शक्तिमान ईश्वर और शास्त्र के प्रति विश्वास बनाये रखने की। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल

श्री गणेशजी के पूजन से होती हैं मनोकामनाएं पूरी

समस्त देवताओं में प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता रिद्धि-सिद्धि विनायक श्री गणेशजी सुख, समृद्धि, धन, ज्ञान विद्या और शांति के प्रदाता हैं। श्री गणेशजी के बारह स्वरूपों की पूजा अर्चना की जाती है। ये स्वरुप हैं : गजानन, लम्बोदर, एकदंत, भाल चन्द्र, मंगल मूर्ति, चतुर्भुज, कृष्ण पंगाक्ष, सिन्दूर् वर्ण, वक्र् तुंड, शूपकर्ण , ओमकार और महाकाय।
वास्तु शास्त्र में श्री गणेशजी के विधि-विधान से पूजन और उनकी प्रतिमा अथवा तस्वीर अनुकूल दिशा में लगाने मात्र से भवन अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान में वास्तु दोषों का शमन होता है।
श्रीगणेशजी के पूजन के लिए प्रत्येक बुधवार या हर माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का दिन् शुभ और विशेष लाभ देने वाला माना गया है। श्री गणेशजी के पूजन के लिए दूब , मोदक, सिन्दूर, लाल कनेर, लोंग , सुपारी और अक्षत आदि का उपयोग करना चाहिए।
श्री गणेशजी के पूजन में तुलसी दल का प्रयोग नहीं किया जाता है। श्री गणेशजी का पूजन पूर्ण श्रद्धा और विश्यास के साथ करने से श्री गणेशजी अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
--- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद





व्यवसाय और वास्तुशास्त्र

# वास्तु शास्त्र के अनुसार फेक्ट्री अथवा व्यावसायिक स्थल के लिए चिकनी मिटटी वाले भूखंड का चयन करना शुभ रहता है। व्यावसायिक भूखंड में न तो शल्य दोष होना चाहिए और न ही भूखंड किसी कब्रिस्तान या शमशान घाट के नजदीक होना चाहिए।

# व्यवसाय की सफ़लता के लिए भूखंड का आकार आयताकार, वर्गाकार या षष्ठ भुजाकार या अष्ट भुजाकर होना शुभ होना चाहिए।

# व्यवसाय स्थल में भारी सामान रखने का स्थान और भण्डार घर हमेशा ईशान (उत्तर-पूर्व कोण) में अथवा आग्नेय (दक्षिण-पूर्व कोण) में ही बनाना चाहिए।

# चेक बुक, पास बुक, जमा बही, मुक़दमे से सम्बंधित कागजात आदि हमेशा ईशान कोण या पूर्व दिशा में ही रखना चाहिए।

# लेखा विभाग तथा लेखा अधिकारी के बैठने का स्थान व्यवसाय स्थल के उत्तरी भाग में रखना शुभ होता है।

# टेलीफोन और फैक्स मशीन पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में रखना शुभ रहता है। इसी प्रकार कंप्यूटर को हमेशा मेज की दायीं ओर रखना चाहिए।

# मेज पर कभी भी फ़ाइलों का ढेर नहीं लगाना चाहिए। ऐसा करने से कार्यालय में नकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है।
-- प्रमोद कुमार अग्रवाल

उपयोगी वास्तु टिप्स

* सोते समय सिर पूर्व अथवा दक्षिण दिशा में ही रखकर सोना चाहिए। दक्षिण दिशा में पैर करके सोना अशुभ होता है।
* जहाँ तक संभव हो भवन का मुख्य प्रवेश द्वार एक ही रखना चाहिए। इसके साथ-साथ द्वार को मांगलिक चिन्हों से भी सजाना शुभ रहता है।
* भवन में लगाई जाने वाली समस्त खिडकियों और दरवाज़ों की ऊंचाई एक समान ही रखनी चाहिए। ऐसा न करने से भवन में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने से उसमे रहने वालों के लिए शुभ नहीं रहता है।
* भवन में रसोई घर का निर्माण हमेशा आग्नेय कोण ( दक्षिण -पूर्व दिशा ) में ही कराना चाहिए।
* नया भवन बनवाते समय खिड़की, दरवाजे, फर्नीचर आदि में हमेशा नयी लकड़ी का ही प्रयोग करना शुभ माना जाता है। पुरानी लकड़ी का उपयोग शुभ नहीं होता है और भवन की सुन्दरता भी प्रभावित होती है।
* भवन में सजावट करते समय लडाई-झगड़े आदि के चित्र, जंगली जीव-जंतुओं, राक्षसों, आदि की मूर्तियाँ नहीं लगानी चाहिए। इस तरह के चित्र और मूर्तियाँ अपना अशुभ प्रभाव छोडती हैं।-- प्रमोद कुमार अग्रवाल