Friday, October 19, 2012

जन्म कुंडली और पितृ दोष

जन्म कुण्डली में सूर्य के पीड़ित होने को पितृ दोष कहा जाता है। पितृ दोष के कारण जातक को धन हानि, संतान कष्ट, संतान जन्म में बाधाएं जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

कुण्डली का दशम भाव पिता से सम्बन्ध रखता है। दशम भाव का स्वामी यदि कुण्डली के छटे, आठवें अथवा बारहवें भाव में बैठा हो तथा गुरु पाप ग्रह से प्रभावित हो अथवा पापी ग्रह की राशि में हो और लग्न व पांचवे भाव के स्वामी पाप ग्रह से सम्बन्ध बनाते हों तो भी पितृ दोष माना जाता है।
पंचम भाव का स्वामी यदि सूर्य हो और वह पाप ग्रह की श्रेणी में हो तथा त्रिकोण में पाप ग्रह हो अथवा उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो इसे पितृ दोष प्रभावित कहा जाता है।
कमजोर लग्न का स्वामी यदि पांचवें भाव में हो और पांचवें भाव का स्वामी सूर्य से सम्बन्ध बनाता है तथा पंचम भाव में पाप ग्रह में हो तो भी पितृ दोष कहलाता है।
अष्टम भाव में सूर्य, पंचम भाव में शनि, लग्न में पाप ग्रह और पंचम भाव के स्वामी के साथ राहु स्थित हो तो पितृ दोष के कारण संतान सुख में कमी आती है।
कुंडली में सूर्य-शनि, सूर्य-राहू का योग केंद्र त्रिकोण 1, 4, 5, 7, 9, और 10 भाव में हो अथवा लग्न का स्वामी 6, 8, या 12 भाव में हो एवं राहु लग्न भाव में हो तो इसी कुण्डली भी पितृ दोष युक्त होती है।
कुण्डली में स्थित पितृ दोष को दूर करने के लिए जातक को प्रत्येक अमावस्या को पितरों की पूजा करनी चाहिए। अपने बड़े-बुजुर्गों, गरीब और जरूरतमंदों की सेवा व सहायता करने से भी पितृ दोष का निवारण होता है। -- प्रमोद कुमार अग्रवाल, ज्योतिषविद

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