Tuesday, June 28, 2011

मृत्यु वरदान भी है

मृत्यु जीवन का अटल सत्य है. जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है. गीता में कहा गया है कि मृत्यु शरीर की होती है, आत्मा की नहीं. शरीर के निष्प्राण होने के बाद आत्मा एक शरीर को छोड़कर नए शरीर में प्रवेश करती है. मृत्यु की इस वास्तविकता को कोई नहीं जान सका है. मृत्यु कुछ लोगों के लिए सजा है तो कुछ लोगों के लिए वरदान है. मृत्यु उन लोगों के लिए सजा है जिनका सारा जीवन पाप कर्मों में बीता है और उन्होंने जीवन भर धोखा-धडी, छल-कपट, बेईमानी, व्यभिचार जैसे गलत कार्य  किये हैं, वहीँ दूसरी ओर मृत्यु उन लोगों के लिए वरदान है जिन्होनें अपना जीवन दूसरों की सेवा, कल्याण और भलाई में बिताया है.
मृत्यु उन लोगों के लिए भी वरदान है जो जीवन भर ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ सत्यवादी और सत्चरित्र वाले रहें हैं. ऐसे व्यक्तिओं की मृत्यु समाज के लिए वरदान स्वरुप है क्योंकि इनके मरने के बावजूद समाज इन्हें  हमेशा याद रखता है और उनके कार्यों  को अनुकरणीय समझते हुए उनके अनुसार चलने के लिए स्वयं उत्प्रेरित होता है. जीवन  को यादगार बनाने का मन्त्र हमारे अपने पास है. हम अपने आप को ईमानदार, समोजोपयोगी ,चरित्रवान, स्पष्टवादी, कर्तव्यनिष्ठ और सर्वगुण संपन्न बनायें, हम हमेशा दूसरों के हित के लिए समर्पित रहें. हमारी इस  कोशिश से  निश्चय ही हमारी मृत्यु  सार्थक और सभी के लिए वरदान  सिद्ध हो सकेगी, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए. - प्रमोद कुमार  अग्रवाल