Monday, April 25, 2011

कुछ समय तक साथ रहना विवाह नहीं

पति और पत्नी के मध्य वैवाहिक संबंधों का अर्थ है कि उनका विवाह किसी भी सामान्य विधि के अंतर्गत पूरे रीति-रिवाज़ के अनुसार हुआ हो और सामान्य विधि के अंतर्गत विवाह को तभी मान्य समझा जाता है जब उनके विवाह एवं रिश्ते को समाज स्वीकार करता हो, 
उनकी विवाह योग्य उम्र हो, उनके कोई दूसरा पति या पत्नी जीवित न हो, वे किसी अन्य  रूप से विवाह के अयोग्य न हों तथा पति-पत्नी के रूप में वे साथ-साथ निवास कर रहे हों.
वर्तमान कानून के अनुसार वैध विवाह के लिए लड़के की उम्र इक्कीस  वर्ष,जबकि लड़की के लिए अठारह वर्ष पूरी होना अनिवार्य है.
एक मामले में सुप्रीम  कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई स्त्री और पुरुष वैध विवाह किये बिना 
पति और पत्नी के रूप में
 कुछ समय तक साथ-साथ रह लेते हैं अथवा उनके बीच कुछ
 समय के लिए  शारीरिक सम्बन्ध बन जाते हैं तो  इससे उनके बीच विवाह की प्रकृति नहीं
 मानी जा सकती है. साधारण शब्दों में इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि कुछ समय तक साथ रहना विवाह नहीं है.(2010 AIR SCW 6731)
-- प्रमोदकुमार अग्रवाल

Saturday, April 23, 2011

मन की सुन्दरता

सुन्दरता की कोई एक निश्चित परिभाषा नहीं है. अलग-अलग व्यक्ति की नज़र में सुन्दरता की अपनी परिभाषा होती है. किसी की नज़र में काले और घुंघराले बाल, लम्बा या नाटा क़द सुन्दर होता है तो कोई बड़ी बड़ी आँखों  वाले गोरे व्यक्ति  को पसंद  करता है. लेकिन क्या वास्तव में तन की सुन्दरता ही सच्ची सुन्दरता है. इसका उत्तर है  नहीं .सुन्दरता तन की नहीं मन की होनी चाहिए. जो लोग मन से सीधे-सच्चे, कोमल  और  सरल स्वभाव के होते हैं, वही मन से सुन्दर कहलाते हैं. ऐसे व्यक्तिओं से जब भी हम मिलते हैं  हार्दिक प्रसन्नता का अहसास होता है.
मन की सुन्दरता को हम माँ की ममता के रूप में देख सकते हैं. अपने बच्चे के मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम होने के बाद भी वह अपने सामान्य बच्चों की तरह उस बच्चे को भी पूर प्यार और दुलार देती है. मन की सुन्दरता में बहुत  से गुणों का समावेश होता है जैसे - विनम्रता, कार्य के प्रति निष्ठा, हंसमुख स्वभाव, स्नेह एवं प्रेमभाव आदि-आदि. हमें याद रखना चाहिए कि वास्तविक सुन्दरता का अर्थ है हमारी आन्तरिक सुन्दरता जिसे हम सिर्फ अपने व्यक्तित्व के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं. तन की सुन्दरता कुछ ही समय के लिए होती है जबकि मन की सुन्दरता स्थाई होती है और हमेशा दूसरों के दिलों में हमारा एक महत्वपूर्ण स्थान बनती है. -- प्रमोदकुमार अग्रवाल
       

Thursday, April 21, 2011

जल ही जीवन है.

जल ही जीवन है. हम सब इस बात को अच्छी तरह से जानते हुए भी जल की बर्बादी करते हैं. जल को बर्बाद करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है. भूमिगत जल का निरंतर दोहन करके हम प्रकृति से प्राप्त इस बहुमूल्य सम्पदा को नष्ट करके अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए समस्या उत्पन्न कर रहे हैं. हमें याद रखना चाहिए की जल के भंडार सीमित नहीं हैं. हमें जल के प्राकृतिक स्रोतों को सभी तरह के प्रदूषण से बचने के लिए मुहिम  छोडनी चाहिए. जल के संरक्षण के लिए भी हम सभी को आगे आने की आवश्यकता है. इसके लिए वाटर हार्वेस्टिंग प्रणाली को अपनाये जाने की भी जरुरत है.ग्रामीण क्षत्रों में पुराने और बंद पड़े तालाबों एवं पोखरों की सफाई कराकर और उन्हें गहरा करके उनमें बरसात के पानी का भण्डारण करना चाहिए. ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगाकर भी हम अपने पर्यावरण को हरा-भरा बनाकर पानी की ज़रूरत को पूरा कर सकते हैं. हमें जल को बचाने के इस अभियान का एक हिस्सा बनकर समाज, देश और समस्त संसार के लिए जल के महत्व के प्रति लोगों को जागरूक करें. -- प्रमोदकुमार अग्रवाल