Monday, October 25, 2010

ऍफ़.आई.आर. दर्ज करना हमारा अधिकार

हमारे साथ घटित होने वाली प्रत्येक आपराधिक घटना की प्रथम सूचना रिपोर्ट [ ऍफ़.आई.आर.] सम्बंधित पुलिस थाने में दर्ज करना हमारा अधिकार है. थाने के पुलिस अधिकारी का ये कर्त्तव्य है कि वह प्रत्येक घटना की रिपोर्ट दर्ज करके उसकी एक प्रति रिपोर्ट दर्ज कराने वाले व्यक्ति को अनिवार्य रूप से दे. 
यदि कोई पुलिस अधिकारी रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी करता है या मना करता है अथवा आधी अधूरी या गलत रिपोर्ट दर्ज करता है तो पीड़ित व्यक्ति [ रिपोर्ट कराने वाला अभियोगी ] अपने साथ घटित वारदात की पूरी जानकारी लिखित में सम्बंधित पुलिस अधिकारी [ पुलिस अधीक्षक या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ] को रजिस्टर्ड डाक से भेज सकता है.यह प्राविधान दंड प्रक्रिया सहिंता के अंतर्गत दिया हुआ है.
 डाक से रिपोर्ट भेजने के बाद भी यदि पीड़ित व्यक्ति की रिपोर्ट दर्ज नहीं होती है तो वह दंड प्रक्रिया सहिंता की धारा 156 [3 ]  के अंतर्गत सक्षम न्यायिक अधिकारी के समक्ष एक प्रार्थना पत्र देकर रिपोर्ट दर्ज कराने का आदेश पारित किये जाने की प्रार्थना कर सकता है. प्रार्थना पत्र के साथ पुलिस अधिकारी को डाक से भेजी गयी रिपोर्ट और डाक विभाग से मिली रसीद की फोटोस्टेट प्रति सलग्न करना ज़रूरी है
 रिपोर्ट में दिए गए तथ्यों से यदि घटना का होना पाया जाता है तो न्यायिक अधिकारी उस मामले की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश सम्बंधित पुलिस थाने को करते हैं. न्यायालय द्वारा पारित आदेश का अनुपालन करने के लिए पुलिस अधिकारी बाध्य हैं और ये उस रिपोर्ट को दर्ज करने से मना नहीं कर सकते हैं.---- प्रमोद कुमार अग्रवाल

रिक्शे चलाना है मौलिक अधिकार

नोएडा के ओद्योगिक एरिया में  सड़कों पर रिक्शा चालकों द्वारा अपने रिक्शे चलाना उनकी आजीविका है जो भारतीय संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार है . रिक्शा चालकों को समुचित क़ानूनी प्रतिबन्ध के बिना रिक्शा चलने से रोका नहीं जा सकता. संविधान के अनुच्छेद 19 [6 ] के तहत रिक्शा चालकों के इस अधिकार पर समुचित प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है.यह मत इलाहाबाद हाई कोर्ट का है.--2010 [ 4 ] ए .एल.जे . पृष्ठ 390  -- प्रमोद कुमार अग्रवाल