Friday, July 30, 2010

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986

उपभोक्ताओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए भारत सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 पारित किया है. इस कानून के अंतर्गत प्रत्येक उपभोक्ता को सुरक्षा, सूचना, चयन, सुनवाई, हर्जाना पाने तथा उपभोक्ता शिक्षा के अधिकार दिए गए हैं. इस कानून के प्रावधान इतने सरल और प्रभावशाली हैं कि कोई भी उपभोक्ता अपने अधिकारों की  रक्षा के लिए उपभोक्ता अदालतों में अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है. इसके लिए जिला स्तर पर उपभोक्ता फोरम, राज्य स्तर पर राज्य आयोग और राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग कार्य कर रहे हैं. जिला फोरम में बीस लाख रुपये तक के वाद, राज्य आयोग में एक करोड़ रुपये तक के वाद तथा राष्ट्रीय आयोग में एक करोड़ से अधिक के वाद दायर किये जा सकते हैं.
विद्युत् विभाग, टेलीफोन, बीमा, रोडवेज, रेलवे, ट्रांसपोर्ट, विकास प्राधिकरण, नगर निगम, जल निगम,  कंपनी, दुकानदार] स्कूल कॉलेज, बेंक आदि विभागों की सेवा में कमी अथवा लापरवाही से पीड़ित कोई भी उपभोक्ता  अपनी शिकायत सभी साक्ष्यों सहित दर्ज करा सकता है. शिकायत के साथ मामूली शुल्क की अदायगी भी करनी पड़ती है. उपभोक्ता अदालतें मामले की पूरी सुनवाई के बाद निर्णय देती हैं. शिकायत सही पाए जाने पर उपभोक्ता की प्रार्थना के अनुसार निर्णय देते हुए समुचित हर्जाना भी दिलाया जाता हैं. यदि कोई उपभोक्ता/विपक्षी  निर्णय से संतुष्ट नहीं होता तो वह राज्य आयोग अथवा राष्ट्रीय आयोग में अपील कर सकता है. - प्रमोदकुमार अग्रवाल, एडवोकेट, सदस्य : हाई कोर्ट बार एसोसिएशन, इलाहाबाद.