Monday, December 27, 2010

प्रेम की भावना सर्वोपरि है.

प्रभु यीशु ने कहा था,'' प्रेम जीवन है और घृणा मृत्यु ''. यीशु के यह  वचन कोई नए नहीं हैं , बल्कि सभी धर्मों में प्रेम की भावना को सर्वोपरि माना गया है. संसार के समस्त ऋषि मुनिओं तथा महापुरुषों ने भी प्रेम की महिमा का अपने-अपने ढंग से बखान किया है. प्रेम मानव जीवन की वह अनमोल निधि है जो हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व को निखार देती  है. प्रेम की महिमा  अपरम्पार है. कहा जाता है कि निःस्वार्थ प्रेम के वशीभूत होकर भगवान भी हमारे सामने प्रकट हो जाते हैं. प्रेम की भावना  पवित्र हो तो यह हमें नया जीवन देती  है. प्रेम अमर है जो कभी मरता नहीं है. सच्चा प्रेम इंसानों को ही नहीं, बल्कि संसार के समस्त जीव जंतुओं को भी अपना बना लेता है. जिनके दिलों में प्रेम की अनमोल भावना होती है वे कभी किसी से घृणा कर ही नहीं सकते. प्रेम में वह शक्ति है जो कठोर से कठोर हृदय वाले लोगों को भी कोमल हृदय का बना देती है. यदि हम अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं, यदि हम चाहते हैं कि हमारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व प्रभावशाली बने और लोग हमें हमारे जाने के बाद भी हमेशा याद रखें तो हमें  प्रेम के मंत्र को अपनाना ही होगा और अपने दिल  से सभी तरह की नफरत की भावना को दूर करके प्रेम की भावना को बनाये रखना होगा. --- प्रमोद कुमार अग्रवाल  

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