Tuesday, November 30, 2010

विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह की प्रक्रिया

विशेष  विवाह अधिनियम,1954 के प्राविधानों के अंतर्गत किसी भी धर्म को मानने वाले  लड़का और लड़की  विधिवत विवाह कर सकते हैं. ऐसा विवाह क़ानूनी रूप से मान्य होता है. इस विवाह को भारत के साथ-साथ विदेशों में भी मान्यता दी जाती है. इस प्रकार के विवाह को संपन्न कराने के लिए प्रत्येक जिले में विवाह अधिकारी  को नियुक्त किया गया है. इक्कीस वर्ष की आयु पूरी  कर चुका कोई भी लड़का तथा अठारह वर्ष की आयु पूरी कर चुकी  कोई भी लड़की जो इस कानून के तहत विवाह करना चाहते हैं, निर्धारित प्रारूप में एक प्रार्थना-पत्र [शपथ-पत्र  एवं आयु और निवास के प्रमाण सहित ]निर्धारित शुल्क अदा करते हुए जिला विवाह  अधिकारी  के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं. विवाह अधिकारी इस आवेदन को प्राप्त करने के बाद तीस दिन का समय देते हुए उस विवाह के सम्बन्ध में आपत्ति की अपेक्षा करते हुए नोटिस जारी करते हैं. यदि तीस दिन के अन्दर उस विवाह के खिलाफ कोई आपत्ति प्राप्त नहीं होती है तो विवाह अधिकारी संतुष्ट होने के उपरांत विवाह संपन्न कराते हैं. विवाह की इस प्रक्रिया के समय  विवाह के दोनों पक्षकारों और तीन गवाहों के हस्ताक्षर कराये  जाते हैं और विवाह प्रमाण-पत्र जारी कर दिया जाता है. इस विवाह की विधिक मान्यता के लिए यह भी आवश्यक है कि लड़का और लड़की प्रतिषिद्ध सम्बन्ध की कोटि में न आते हों, वे पागल या जड़ न हों तथा उनकी पहले से कोई जीवित पत्नी या पति न हो. यदि इस विवाह के नोटिस के बाद कोई आपत्ति प्राप्त होती है तो विवाह अधिकारी उस आपत्ति के निस्तारण के बाद ही विवाह की कार्यवाही संपन्न कराते हैं.
विशेष विवाह अधिनियम के प्राविधानों के तहत किसी भी धर्म के पहले से ही विवाहित पति और पत्नी भी अपने विवाह का पंजीकरण करा सकते हैं, लेकिन इसके लिए यह आवश्यक है कि वे विवाह संपन्न होने के बाद पति-पत्नी के रूप में एक साथ रह रहे हों,  पागल,विकृत या अस्वस्थ  मस्तिष्क के न हों, दोनों की उम्र इक्कीस वर्ष से कम न हो तथा वे प्रतिषिद्ध सम्बन्ध के दायरे में न आते हों. पहले से विवाहित पति-पत्नी के विवाह को पंजीकृत कराने की प्रक्रिया पूर्ववत है. -- PRAMOD KUMAR AGRAWAL

Monday, November 29, 2010

बैंक भी लोकपाल के दायरे में

भारतीय रिजर्व बैंक के उप महा प्रबंधक के अनुसार अब बैंक भी लोकपाल के दायरे में आ गए हैं. यदि बैंकों की कार्य प्रणाली से किसी उपभोक्ता को किसी प्रकार का कोई नुक्सान होता है तो वह हर्जाना प्राप्त करने के लिए अपनी शिकायत सभी साक्ष्य सहित सम्बंधित बैंक के खिलाफ अपने क्षेत्र के बैंकिंग लोकपाल को भेज सकता है.

मानसिक तनाव से बीमारियाँ

### लम्बे समय तक रहने वाला मानसिक तनाव शरीर में कई प्रकार की घातक बीमारियों को जन्म देता है. स्पेन के शोधकर्ताओं के अनुसार ज्यादा दिनों तक यदि हम मानसिक और शारीरिक तनाव मे रहते हैं तो कार्टिसोल नामक हार्मोन के स्तर में वृद्धि हो जाती है, जिससे माँयोपेथी, डायबिटीज, हायपरटेंशन, कमजोरी और दिल का दौरा पड़ने की आशंका रहती है.

अनुकम्पा नियुक्ति का दावा नहीं

### मृतक कर्मचारी के साथ कानूनी रूप से विवाह न करने वाली महिला परिवार की परिभाषा में नहीं आती है. ऐसी महिला उस कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसके स्थान पर अनुकम्पा नियुक्ति दिए जाने का दावा नहीं कर सकती. मृतक कर्मचारी की कानूनी रूपसे विवाहित पत्नी और उससे उत्पन्न बच्चे ही अनुकम्पा नियुक्ति के लिए सक्षम हैं. - 2006 (3) ए एल जे 774*** PRAMOD KUMAR AGRAWAL


Saturday, November 27, 2010

बेरोजगार श्रमिकों के लिए राजीव गाँधी श्रमिक कल्याण योजना

कर्मचारी राज्य बीमा निगम के क़ानूनी प्रावधानों के अंतर्गत आने वाले किसी कारखाने अथवा स्थापना के बंद हो जाने या गैर रोज़गार चोट  लगने के कारण   कम से कम चालीस प्रतिशत हुई निशक्तता के कारण बेरोजगार हुए श्रमिकों को बेरोज़गारी भत्ता प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा ' राजीव गाँधी श्रमिक कल्याण योजना ' चलाई जा रही है. इस योजना का लाभ लेने के लिए यह आवश्यक है कि बेरोजगार हुए श्रमिक ने बेरोजगार होने  की  तारीख से न्यूनतम तीन वर्ष पहले  की  अवधि के लिए निर्धारित अंशदान किया हो तथा वह कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम के तहत बीमाकृत व्यक्ति की  परिभाषा में आता हो.  बेरोजगार हुए श्रमिक को नियमानुसार एक वर्ष तक की अवधि के लिए बेरोज़गारी भत्ता दिया जाता है. बेरोज़गारी भत्ता प्राप्त करने के लिए उस श्रमिक को अपना दावा  बेरोजगार होने की तारीख से तीन माह के अन्दर निर्धारित प्रारूप यू. ए. - 1 में अपने सम्बंधित कर्मचारी राज्य बीमा निगम के कार्यालय में जमा करना अनिवार्य है. बेरोजगार हुए श्रमिक को बेरोज़गारी भत्ता उस दशा में नहीं दिया जायेगा यदि उसने तीन वर्ष तक अंशदान नहीं किया  हो, उसकी सेवा करने की अवधि [उम्र]  पूरी हो चुकी हो, उसे किसी अनुशासन कार्यवाही के अंतर्गत सेवा से हटाया गया हो अथवा उस कर्मचारी की मृत्यु हो गयी हो. बेरोजगार हुए बीमाकृत श्रमिक को बेरोज़गारी भत्ते का भुगतान केवल रेखांकित चेक द्वारा ही किया जाता है.  -- प्रमोदकुमार अग्रवाल

Thursday, November 25, 2010

चेक का भुगतान न होने पर क़ानूनी कार्यवाही

खाते में धनराशि न होने के आधार पर यदि किसी चेक की रकम खाता धारक को प्राप्त नहीं होती है तो वह चेक जारी करने वाले व्यक्ति के खिलाफ परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138  के अंतर्गत सक्षम न्यायालय में परिवाद- पत्र दाखिल कर सकता है, लेकिन इससे पहले उसे चेक जारी करने वाले व्यक्ति को एक क़ानूनी नोटिस भिजवाना होगा. यह नोटिस रिटर्न मीमो के साथ चेक के बेंक से लौटा दिए जाने के बाद रिटर्न मीमो की तारीख से एक महीने की अवधि में दिया जाना  आवश्यक है. इस नोटिस में  उस चेक के बेंक से लौट दिए जाने [ अनादृत होने ] का विवरण देते हुए चेक की रकम पंद्रह दिन के अन्दर अदा करने और रकम अदा न करने की दशा में क़ानूनी कार्यवाही किये जाने का उल्लेख करना होगा. नोटिस भिजवाते समय इस समय सीमा का विशेष ध्यान  रखना अनिवार्य है अन्यथा दोष पूर्ण नोटिस के आधार पर  की जाने वाली क़ानूनी कार्यवाही अवैध हो जाएगी. चेक से भुगतान के मामले में यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि  चेक को उस पर दी गयी तारीख से छह माह की अवधि में भुगतान हेतु बेंक में प्रस्तुत किया जाना चाहिए. यदि चेक की अवधि समाप्त हो जाये तो चेक जारी करने वाले से उस चेक की अवधि बढ़वा ली जाये अथवा उसके बदले नया चेक ले लिया जाये. चेक पर किसी तरह की काटपीट भी नहीं  होनी चाहिए वरना बेंक चेक की रकम अदा करने से मना कर सकता है. 
-- प्रमोदकुमार अग्रवाल, एडवोकेट , सदस्य : हाई कोर्ट बार एसोसिएशन, इलाहाबाद. 

Saturday, November 20, 2010

COMPLAINT AGAINST DISHONEST ADVERTISEMENT

IF YOU THINK AN ADVERTISEMENT OF ANY NEWS PAPER, MAGAZINE, NEWS CHANNEL OR ANY OTHER  CHANNEL ETC.IS MISLEADING, DISHONEST OR INDECENT , YOU  MAY MAKE COMPLAINT OR CONTACT TO :

] THE ADVERTISING STANDARDS COUNCIL OF INDIA,
  78, TARDEO ROAD, MUMBAI - 400 034
   Website : http: //www.ascionline.org
    Phone : 022- 23513982
   email : asci@vsnl.com
             --- PRAMOD KUMAR AGRAWAL, ADVOCATE        [ MEMBER : HIGH COURT BAR ASSOCIATION, ALLAHABAD ] [NEWSLINE AGRA]

Friday, November 19, 2010

लाभदायक होता है रस्सी कूदना

वज़न कम करने, क़द बढ़ाने और मांस पेशियों को मज़बूत बनाने के लिए रस्सी कूदना लाभदायक होता है. डॉक्टरों की राय में रस्सी कूदने से शरीर में जमा चर्बी तेज़ी से घटने लगती है और भविष्य मे हड्डियों की कमजोरी / ऑस्टिओपोरोसिस का खतरा कम हो जाता है. सेहत के लिए रस्सी कूदने के दौरान आराम करना, एथलेटिक जूते पहनना और रस्सी कूदने की जगह का खुला होना ज़रूरी है. रस्सी कूदने के आधा घंटे के बाद अंकुरित चना या मूंग, नीबू पानी, दूध या ताज़ा फलों का रस लेना उपयोगी रहता है. हाई ब्लड प्रेशर, हर्निया तथा दिल के मरीजों को रस्सी कूदने से बचना चाहिए अथवा अपने डॉक्टर की सलाह के बाद ही रस्सी कूदनी चाहिए.[ न्यूज़लाइन आगरा ]  




Tuesday, November 16, 2010

यात्री के परिजनों को हर्जाना

रेल अथवा परिवहन निगम की बस में यात्र कर रहे यात्री के चोट लग जाने  अथवा उसकी मृत्यु हो जाने की दशा में उसे अथवा उसके परिजनों को हर्जाना दिए जाने के सम्बन्ध में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दो अलग-अलग निर्णय पारित किये गए हैं. एक मामले में ट्रेन में चढ़ते समय ट्रेन के चल देने के कारण गंभीर रूप से घायल यात्री के अस्पताल में मृत्यु हो गयी. रेलवे का कहना था कि  यात्री ने आत्महत्या की  थी. हाई कोर्ट ने रेलवे के तर्क को निरस्त करते हुए यात्री के परिजनों को हर्जाना दिलाया. (2010 (5)ALJ535)
दूसरे मामले मे बस की छत पर यात्रा कर रहे यात्री की बस दुर्घटना में मृत्यु हो जाने पर हाई कोर्ट ने उसके परिवार वालों को हर्जाना पाने का अधिकारी माना और सम्बंधित बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह मृत यात्री के परिजनों को हर्जाना अदा करे. (2010 (5)ALJ405)-प्रमोद कुमार अग्रवाल, एडवोकेट

Thursday, November 11, 2010

थाने पर नहीं बिठाये जा सकते गवाह

 किसी महिला, नाबालिग युवती अथवा अन्य व्यक्ति को जो किसी आपराधिक मामले में गवाह या पीड़ित हो, पुलिस द्वारा मेडिकल जांच या मेडिकल रिपोर्ट या अन्य उद्देश्य के लिए चौबीस घंटे से ज्यादा समय तक पुलिस थाना अथवा चौकी पर बिठाये  नहीं रखा जा सकता है. दंड प्रक्रिया संहिता अथवा किसी अन्य कानून के अंतर्गत इस तरह से पीड़ित पक्ष या गवाह को मेडिकल रिपोर्ट के नाम पर पुलिस द्वारा रोके रखने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है. यदि पुलिस द्वारा ऐसा किया जाता है तो उसका यह कृत्य भारतीय संविधान के अनुच्छेद  21 के अंतर्गत दिए गए आज़ादी के अधिकार का हनन है. इलाहाबाद हाई कोर्ट [ 2010 [ 5 ] एएलजे 92  ] ने एक मामले में  यह मत व्यक्त करते हुए पीड़ित पक्ष को राज्य सरकार से बतौर हर्जाना 25  हज़ार  रुपये दिलाने का आदेश पारित किया -- प्रमोद कुमार अग्रवाल [ न्यूज़लाइन आगरा ]