Tuesday, October 26, 2010

भरण - पोषण का अधिकार

दंड प्रक्रिया सहिंता की धारा 125 के प्राविधानों के अंतर्गत कानूनी रूप से विवाहित पत्नी, माता-पिता, नाबालिग अथवा मानसिक व शारीरिक रूप से अपना भरण पोषण करने में असक्षम पुत्र और पुत्री अपने पति, पुत्र या पुत्री अथवा माता-पिता से भरण- पोषण [ गुज़ारा- भत्ता ] प्राप्त करने के लिए अपने क्षेत्र के न्यायालय में एक परिवाद  पत्र [ प्रार्थना- पत्र ]दाखिल कर सकते हैं. न्यायालय उस प्रार्थना- पत्र को अपने यहाँ रजिस्टर्ड करने के बाद विपक्षी पति, पुत्र या पुत्री अथवा माता- पिता को निर्धारित तिथि पर अपना जवाब देने के लिए सूचना भेजने का आदेश पारित करता है .
न्यायालय में दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों का अवलोकन करने और बहस सुनने के बाद यदि यह पता चलत़ा है कि विपक्षी बिना किसी उचित कारण के परिवादी का भरण- पोषण नहीं कर रहा है तो न्यायालय विपक्षी की आमदनी को ध्यान में रखते हुए उसे यह आदेश दे सकता है कि  वह परिवादी को आदेशित धनराशि भरण- पोषण के रूप मे प्रतिमाह अदा करे.
 परिवादी अथवा विपक्षी यदि न्यायालय के आदेश से संतुष्ट न हों तो वे उस आदेश के विरुद्ध प्रवर  न्यायालय में जा सकते हैं. न्यायालय द्वारा पारित भरण- पोषण की रकम को कम या समाप्त कराने अथवा उसमे वृद्धि करने के निवेदन के साथ इसी कानून के प्रावधानों के अंतर्गत एक नया प्रार्थना- पत्र दिया जा सकता है. ऐसी दशा मे पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य व बहस के आधार पर उचित आदेश पारित कर सकेगा.
अभी हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में यह निर्णय दिया है कि लम्बे समय तक पति- पत्नी के रूप में लिव एंड रिलेशनशिप में रही महिला भी भरण- पोषण के लिए न्यायालय में प्रार्थना पत्र दाखिल कर सकती है यदि विपक्षी द्वारा उसके भरण- पोषण से इनकार कर दिया गया हो अथवा उसका   उत्पीडन किया गया हो.-- प्रमोद कुमार अग्रवाल

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