Wednesday, October 13, 2010

गीता सार

बेकार की चिंता हम क्यों करते हैं
बेकार में ही हम किसी से क्यों डरते हैं
कोई भी हमें  मार नहीं सकता .आत्म अज़र अमर है.
आत्म न कभी जन्म लेती है और न ही कभी मरती है.
इस संसार में जो हो रहा है  अच्छा ही हो रहा है.
जो भी अब तक हुआ है वो भी  अच्छा ही हुआ है.
और आगे भी जो होगा वो अच्छा ही होगा.
जो बीत गया उसके लिए पश्चाताप करने से
 कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.
आने वाले वक़्त की चिंता हमें नहीं करनी चाहिए .
अपने वर्तमान को जीने में  ही समझदारी है.
जो हाथ से निकल गया 
उसके लिए बेकार में ही हम  क्यों रोते हैं .
हमारा क्या चला गया.
हम अपने साथ न कुछ लाये थे 
और न ही हमने कुछ उत्पन्न किया.
जो भी हमने लिया , यहीं से लिया.
और जो हमने दिया, यहीं से दिया.
हम खाली हाथ आये थे 
और हमें खाली हाथ ही चले जाना है
जो आज हमारा है वो कल किसी और का होगा.
उसे अपना समझकर खुश होने से कोई लाभ नहीं.
परिवर्तन इस संसार का नियम है.
और मृत्यु जीवन का अटल सत्य है.
एक पल में हम अपार दौलत के मालिक बन जाते हैं
तो अगले ही पल हम बिल्कुल कंगाल हो जाते हैं.
तेरा-मेरा, छोटा-बड़ा , अपना-पराया
अपने मन से दूर करने में ही हमारी भलाई है.
ये शरीर तक हमारा नहीं है.
और न ही हम इस शरीर के हैं.
ये शरीर पांच तत्वों अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी
और आकाश से मिलकर बना है
और अंत में इन्ही तत्वों में मिल जाएगा.
हम अपने आप को भगवान् के समक्ष अर्पित कर दें.
यही सबसे उत्तम सहारा है.
और भय ,चिंता और शोक से मुक्ति पाने का
एक सर्वश्रेष्ठ मार्ग भी है .
हम जो कुछ भी करें भगवान् को अर्पण करें.
यही जीवन मुक्ति का सरल और सच्चा मार्ग है.

 --  प्रस्तुति :  प्रमोदकुमार अग्रवाल, 

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