Saturday, October 30, 2010

उपभोक्ता संरक्षण कानून और उपभोक्ता

  ###  उपभोक्ता संरक्षण कानून के प्रावधान आम व्यक्ति के उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा हेतु बनाये गए हैं. इस कानून के तहत कोई भी उपभोक्ता अपने अधिकारों के संरक्षण के लिए आर्थिक क्षेत्राधिकार के अनुसार जिला उपभोक्ता फोरम, राज्य आयोग अथवा राष्ट्रीय आयोग में वाद का कारण उत्पन्न होने की तिथि से  दो  वर्ष की अवधि में अपनी शिकायत दर्ज  करा सकता है. शिकायत के साथ उपभोक्ता को शिकायत के तथ्यों के समर्थन में एक शपथ पत्र तथा सभी अभिलेखीय सबूत दाखिल करना ज़रूरी है. 
###  उपभोक्ता कानून की परिधि में आने वाले किसी विभाग जैसे -  बीमा निगम, टेलीफोन विभाग, विद्युत कारपोरेशन, आवास-विकास, विकास प्राधिकरण, रोडवेज, रेलवे और अन्य सेवाए प्रदान करने वाले विभाग, कोई दूकानदार, वितरक, निर्माता कम्पनी,डॉक्टर,नर्सिंग होम, होस्पीटल आदि के खिलाफ  सेवा में कमी या लापरवाही के कारण हुए नुकसान की भरपाई, हर्जाना  व वाद का खर्चा मांगते हुए अपनी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है लेकिन इसके लिए ये ज़रूरी है कि उस विभाग या विपक्षी द्वारा जो सेवाएँ उपलब्ध कराई गयी  हो उसके लिए कोई भुगतान अदा किया गया हो.
###  जिला उपभोक्ता फोरम द्वारा दिए गए आदेश के खिलाफ व्यथित पक्ष उपभोक्ता राज्य आयोग में, राज्य आयोग के आदेश के खिलाफ नेशनल कमीशन में और नेशनल कमीशन के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है. अपील के लिए आदेश की तारीख़ से तीस दिन का समय निर्धारित है.
###  उपभोक्ता कानून के तहत पारित आदेश का जान-बूझ कर अनुपालन न करने वाले व्यक्ति को सजा दिए जाने का भी प्रावधान है. इसी प्रकार महज़ परेशान करने और उत्पीडन करने के लिए  दायर की गयी शिकायत के मामलों में शिकायत निरस्त करने के साथ-साथ शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्ति के खिलाफ  भी दस हज़ार रुपये तक के हर्जाने का आदेश किया जा सकता है. यह हर्जाना  उस व्यक्ति को दिलाया जाता है जिसके खिलाफ वह शिकायत की गयी हो. 
 ---- प्रमोदकुमार अग्रवाल

Tuesday, October 26, 2010

भरण - पोषण का अधिकार

दंड प्रक्रिया सहिंता की धारा 125 के प्राविधानों के अंतर्गत कानूनी रूप से विवाहित पत्नी, माता-पिता, नाबालिग अथवा मानसिक व शारीरिक रूप से अपना भरण पोषण करने में असक्षम पुत्र और पुत्री अपने पति, पुत्र या पुत्री अथवा माता-पिता से भरण- पोषण [ गुज़ारा- भत्ता ] प्राप्त करने के लिए अपने क्षेत्र के न्यायालय में एक परिवाद  पत्र [ प्रार्थना- पत्र ]दाखिल कर सकते हैं. न्यायालय उस प्रार्थना- पत्र को अपने यहाँ रजिस्टर्ड करने के बाद विपक्षी पति, पुत्र या पुत्री अथवा माता- पिता को निर्धारित तिथि पर अपना जवाब देने के लिए सूचना भेजने का आदेश पारित करता है .
न्यायालय में दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों का अवलोकन करने और बहस सुनने के बाद यदि यह पता चलत़ा है कि विपक्षी बिना किसी उचित कारण के परिवादी का भरण- पोषण नहीं कर रहा है तो न्यायालय विपक्षी की आमदनी को ध्यान में रखते हुए उसे यह आदेश दे सकता है कि  वह परिवादी को आदेशित धनराशि भरण- पोषण के रूप मे प्रतिमाह अदा करे.
 परिवादी अथवा विपक्षी यदि न्यायालय के आदेश से संतुष्ट न हों तो वे उस आदेश के विरुद्ध प्रवर  न्यायालय में जा सकते हैं. न्यायालय द्वारा पारित भरण- पोषण की रकम को कम या समाप्त कराने अथवा उसमे वृद्धि करने के निवेदन के साथ इसी कानून के प्रावधानों के अंतर्गत एक नया प्रार्थना- पत्र दिया जा सकता है. ऐसी दशा मे पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य व बहस के आधार पर उचित आदेश पारित कर सकेगा.
अभी हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में यह निर्णय दिया है कि लम्बे समय तक पति- पत्नी के रूप में लिव एंड रिलेशनशिप में रही महिला भी भरण- पोषण के लिए न्यायालय में प्रार्थना पत्र दाखिल कर सकती है यदि विपक्षी द्वारा उसके भरण- पोषण से इनकार कर दिया गया हो अथवा उसका   उत्पीडन किया गया हो.-- प्रमोद कुमार अग्रवाल

Monday, October 25, 2010

ऍफ़.आई.आर. दर्ज करना हमारा अधिकार

हमारे साथ घटित होने वाली प्रत्येक आपराधिक घटना की प्रथम सूचना रिपोर्ट [ ऍफ़.आई.आर.] सम्बंधित पुलिस थाने में दर्ज करना हमारा अधिकार है. थाने के पुलिस अधिकारी का ये कर्त्तव्य है कि वह प्रत्येक घटना की रिपोर्ट दर्ज करके उसकी एक प्रति रिपोर्ट दर्ज कराने वाले व्यक्ति को अनिवार्य रूप से दे. 
यदि कोई पुलिस अधिकारी रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी करता है या मना करता है अथवा आधी अधूरी या गलत रिपोर्ट दर्ज करता है तो पीड़ित व्यक्ति [ रिपोर्ट कराने वाला अभियोगी ] अपने साथ घटित वारदात की पूरी जानकारी लिखित में सम्बंधित पुलिस अधिकारी [ पुलिस अधीक्षक या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ] को रजिस्टर्ड डाक से भेज सकता है.यह प्राविधान दंड प्रक्रिया सहिंता के अंतर्गत दिया हुआ है.
 डाक से रिपोर्ट भेजने के बाद भी यदि पीड़ित व्यक्ति की रिपोर्ट दर्ज नहीं होती है तो वह दंड प्रक्रिया सहिंता की धारा 156 [3 ]  के अंतर्गत सक्षम न्यायिक अधिकारी के समक्ष एक प्रार्थना पत्र देकर रिपोर्ट दर्ज कराने का आदेश पारित किये जाने की प्रार्थना कर सकता है. प्रार्थना पत्र के साथ पुलिस अधिकारी को डाक से भेजी गयी रिपोर्ट और डाक विभाग से मिली रसीद की फोटोस्टेट प्रति सलग्न करना ज़रूरी है
 रिपोर्ट में दिए गए तथ्यों से यदि घटना का होना पाया जाता है तो न्यायिक अधिकारी उस मामले की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश सम्बंधित पुलिस थाने को करते हैं. न्यायालय द्वारा पारित आदेश का अनुपालन करने के लिए पुलिस अधिकारी बाध्य हैं और ये उस रिपोर्ट को दर्ज करने से मना नहीं कर सकते हैं.---- प्रमोद कुमार अग्रवाल

रिक्शे चलाना है मौलिक अधिकार

नोएडा के ओद्योगिक एरिया में  सड़कों पर रिक्शा चालकों द्वारा अपने रिक्शे चलाना उनकी आजीविका है जो भारतीय संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार है . रिक्शा चालकों को समुचित क़ानूनी प्रतिबन्ध के बिना रिक्शा चलने से रोका नहीं जा सकता. संविधान के अनुच्छेद 19 [6 ] के तहत रिक्शा चालकों के इस अधिकार पर समुचित प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है.यह मत इलाहाबाद हाई कोर्ट का है.--2010 [ 4 ] ए .एल.जे . पृष्ठ 390  -- प्रमोद कुमार अग्रवाल

Wednesday, October 13, 2010

गीता सार

बेकार की चिंता हम क्यों करते हैं
बेकार में ही हम किसी से क्यों डरते हैं
कोई भी हमें  मार नहीं सकता .आत्म अज़र अमर है.
आत्म न कभी जन्म लेती है और न ही कभी मरती है.
इस संसार में जो हो रहा है  अच्छा ही हो रहा है.
जो भी अब तक हुआ है वो भी  अच्छा ही हुआ है.
और आगे भी जो होगा वो अच्छा ही होगा.
जो बीत गया उसके लिए पश्चाताप करने से
 कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.
आने वाले वक़्त की चिंता हमें नहीं करनी चाहिए .
अपने वर्तमान को जीने में  ही समझदारी है.
जो हाथ से निकल गया 
उसके लिए बेकार में ही हम  क्यों रोते हैं .
हमारा क्या चला गया.
हम अपने साथ न कुछ लाये थे 
और न ही हमने कुछ उत्पन्न किया.
जो भी हमने लिया , यहीं से लिया.
और जो हमने दिया, यहीं से दिया.
हम खाली हाथ आये थे 
और हमें खाली हाथ ही चले जाना है
जो आज हमारा है वो कल किसी और का होगा.
उसे अपना समझकर खुश होने से कोई लाभ नहीं.
परिवर्तन इस संसार का नियम है.
और मृत्यु जीवन का अटल सत्य है.
एक पल में हम अपार दौलत के मालिक बन जाते हैं
तो अगले ही पल हम बिल्कुल कंगाल हो जाते हैं.
तेरा-मेरा, छोटा-बड़ा , अपना-पराया
अपने मन से दूर करने में ही हमारी भलाई है.
ये शरीर तक हमारा नहीं है.
और न ही हम इस शरीर के हैं.
ये शरीर पांच तत्वों अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी
और आकाश से मिलकर बना है
और अंत में इन्ही तत्वों में मिल जाएगा.
हम अपने आप को भगवान् के समक्ष अर्पित कर दें.
यही सबसे उत्तम सहारा है.
और भय ,चिंता और शोक से मुक्ति पाने का
एक सर्वश्रेष्ठ मार्ग भी है .
हम जो कुछ भी करें भगवान् को अर्पण करें.
यही जीवन मुक्ति का सरल और सच्चा मार्ग है.

 --  प्रस्तुति :  प्रमोदकुमार अग्रवाल,