Saturday, March 13, 2010

व्यक्तित्व के विकास में बाधक दोहरी मानसिकता

लोग कहते हैं कि हम अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं, जैसा हमारे मन में आता है करते हैं. लेकिन ये सच नहीं है क्योंकि हम अक्सर दूसरों  के  अनुसार चलते हैं .जब हम अपनी मर्ज़ी से चलने क़ी कोशिश करना चाहते हैं तो लोग हमारे रास्ते में तरह-तरह क़ी रुकावटें पैदा करने में लग जाते हैं.वे कभी सामजिक  तो कभी पारिवारिक रीतिरिवाजों का उदाहरण देकर हमें अपनी मर्ज़ी से चलाने लगते हैं और हम खुश होकर अपने अस्तित्व को भुला बैठते हैं ये दोहरी मानसिकता हमारे व्यक्तित्व के विकास में बाधक बन जाती है और हम जीवन क़ी दौड़ में पिछड़ जाते हैं. एक तरफ तो हम कबीरदास के दोहों में बचपन से रटते हैं कि पत्थर क़ी बजाय आटा पीसने वाली चक्की क़ी पूजा करना कहीं अधिक अच्छा है इसी प्रकार लाउडस्पीकर लगाकर शोरगुल करने से भगवान क्या  जल्दी सुन लेते हैं., वहीँ दूसरी ओर हम जगह-जगह तेज आवाज़ वाले वाद्य यन्त्र दिन रात  बजाकर दूसरों की सुख सुविधा में बाधा उत्पन्न करते हैं.ये उचित नहीं है.हमें कोई हक नहीं क़ी हम किसी क़ी आज़ादी में दखल दें यदि हम अपना विकास चाहते हैं तो हमें दोहरी मानसिकता का परित्याग करना ही होगा . इसी में हम सबकी भलाई है-- प्रमोद कुमार अग्रवाल, एडवोकेट एवं पत्रकार .

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